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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५१ उस (चित्तवृत्ति) में प्रतिबिम्बित चैतन्य भी, जिसप्रकार दीपक की प्रभा सूर्य की प्रभा को प्रकाशित करने में असमर्थ होती हुई, उससे अभिभूत हो जाती है। ठीक उसीप्रकार स्वयं प्रकाशमान, प्रत्यक्, अभिन्न, परमब्रह्म को अवभासित करने में असमर्थ होने से, उससे अभिभूत हुई, अपनी उपाधिरूप अखण्डचित्तवृत्ति को नष्ट कर देने से, दर्पण के अभाव में मुख के प्रतिबिम्ब की (अपेक्षा) मुखमात्र रहने के समान, आन्तरिक आत्मा से अभिन्न परमब्रह्ममात्र ही रह जाता है॥ 'चन्द्रिका' - प्रस्तुत अंश को समझने के लिए वेदान्तियों की लौकिक- ज्ञान विषयक प्रक्रिया को समझना आवश्यक है। तदनुसार घट-पट आदि के ज्ञान में सर्वप्रथम वृत्ति उस पदार्थ के सम्बन्ध में स्थित अज्ञान को दूर करती है। तत्पश्चात् उसका 'चित्' प्रतिबिम्ब पदार्थ का आकार धारण करके उसे भासित करता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि समस्त भौतिक पदार्थों के जड़ होने के कारण, उनमें स्वयं प्रकाशित होने की सामर्थ्य के अभाव के कारण 'चित्' प्रतिबिम्ब आवश्यक होता है। इसलिए लौकिकज्ञान में सामान्यरूप से अज्ञान को दूर करना रूप बुद्धि की वृत्ति एवं चित् का प्रतिबिम्बरूप फल अथवा आभास दोनों आवश्यक हैं। जबकि ब्रह्मसाक्षात्कार में केवल तद्विषयक अज्ञान को दूर करना रूप वृत्ति की ही अपेक्षा रहती है। चित् प्रतिबिम्बरूप फल या उसके आभास की इसलिए आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ब्रह्म स्वयं प्रकाशमान है। उसे किसी से प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मज्ञान एवं लौकिकज्ञान में यही अन्तर है। जिसकी ओर ग्रन्थकार ने प्रस्तुत अंश में सङ्केत किया है। वेदान्त की दृष्टि में अधिकारी को गुरु अध्यारोप एवं अपवादन्याय से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तत् एवं त्वम् पदों के अर्थों को भलीप्रकार समझाने के पश्चात् अखण्ड अर्थ का बोध कराता है। जिसके परिणामस्वरूप उसके हृदय में अखण्ड आकार से आकारित इसप्रकार की चित्तवृत्ति का उदय होता है कि मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव, परमानन्द- स्वरूप, अनन्त एवं अद्वैतब्रह्म हूँ। किन्तु इस विषय में यदि कोई यह शङ्का करे कि चित्तवृत्ति तो जड़ है, जो स्वयंप्रकाश, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, ब्रह्म को अपना विषय ठीक उसीप्रकार बनाकर उदित नहीं हो सकती, जिसप्रकार दीपक का प्रकाश सूर्यमण्डल को