वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें२५२ वेदान्तसार प्रकाशित नहीं कर सकता। इसी के उत्तर में ग्रन्थकार ‘सा तु’ इत्यादि गद्यखण्ड को प्रस्तुत करते हैं- अर्थात् वह चित्तवृत्ति परमशुद्धचैतन्य को अपना विषय नहीं बनाती, अपितु वह तो अज्ञान-विशिष्ट प्रत्यक्-अभिन्न विषय वाली होती है। उसमें चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उस स्थिति में वह प्रत्यक् चैतन्यगत अज्ञान रूप आवरण को दूर कर देती है। अतः इस अज्ञान को दूर करना ही उस वृत्ति के उदय का प्रयोजन है। चैतन्यगत परब्रह्मविषयक अज्ञान के आवरण के विनष्ट होते ही अधिकारी को इसप्रकार की अनुभूति होने लगती है कि मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, आदिस्वरूप परब्रह्म हूँ। इस प्रसङ्ग में ‘प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का पुनः प्रस्तुत की जा सकती है कि गुरु द्वारा ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि उपदेशवाक्यों से उत्पन्न तात्त्विकज्ञान से आभासित होने वाली, अखण्डचैतन्यवृत्ति के कारण अधिकारी का प्रत्यक् चैतन्यविषयक अज्ञान भले ही विनष्ट हो जाए, किन्तु उस स्थिति में भी अज्ञान का कार्य सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च का आभास तो उसे प्रत्यक्षरूप में होता ही रहेगा। ऐसी स्थिति में उसे अद्वैत की अनुभूति कैसे हो सकती है? इस शङ्का का निवारण करते हुए कहते हैं कि सामान्यसिद्धान्त है कि कारण के नष्ट होने पर कार्य स्वतः विनष्ट हो जाता है। ठीक उसीप्रकार जैसे पट के कारण तन्तु के नष्ट होने पर पट स्वतः ही नष्ट हो जाता है। सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च यहाँ कार्य है तथा अज्ञान कारण है, इसलिए अज्ञानरूपी कारण के नष्ट होने पर चराचरप्रपञ्चरूप कार्य भी स्वतः ही नष्ट हो जाएगा। पुनः यदि कोई कहे कि उस स्थिति में भी अखण्ड आकार से आकारित चित्तवृत्ति के विद्यमान रहने से अद्वैत की सिद्धि तो तब भी नहीं होगी? इसके उत्तर में ग्रन्थकार कहते हैं कि-अखण्ड आकार से आकारित वह वृत्ति भी वस्तुतः अज्ञान एवं उसके कार्यप्रपञ्च के अन्तर्गत ही आती है। इसलिए कारणभूत अज्ञान के नष्ट होने पर प्रपञ्च एवं वृत्ति दोनों ही विनष्ट होंगे। अतः इसप्रकार के विरोध की सम्भावना नहीं रहेगी। पुनः यदि कहा जाए कि अज्ञान, सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च एवं अखण्ड आकार से आकारित चित्तवृत्ति, इन तीनों के नष्ट हो जाने पर भी वृत्ति में