भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २५९ ब्रह्म का अनुभव कराने वाली वृत्ति एवं घटादिकों का प्रत्यक्ष कराने वाली इस वृत्ति की भिन्नता स्पष्ट है। विशेष-(1) 'मनसा मनुते' इत्यादि श्रुतिवाक्यों में मन से अभिप्राय 'वृत्ति' से ग्रहण करना चाहिए। (2) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-५६ [बुद्धि एवं इसमें प्रतिबिम्बित चिदाभास] [सामान्यतः लौकिक प्रत्यक्ष-प्रक्रिया] प्रथमतः [घट में व्याप्त होते हैं] (अन्तःकरण) [परिणामस्वरूप] [विषयरूप में परिवर्तित होने पर] [घट विषयक अज्ञान की समाप्ति] [उसमें प्रतिबिम्बित चिदाभास] [उससे आच्छन्न चैतन्य] [तत्पश्चात् बुद्धि में स्थित चिदाभास द्वारा घट प्रकाशित होता है।] [द्वारा विषय का साक्षात्कार] (फलव्याप्ति) (वृत्ति व्याप्ति) [प्रकाशयुक्त शुद्ध चैतन्य में विलीन] [निषेध] [शास्त्रकारों द्वारा] [अपेक्षित] (अहं ब्रह्मास्मि) $\longleftarrow$ (ब्रह्मज्ञान में) अवतरणिका-परमशुद्धचैतन्य का साक्षात्कार होने तक अधिकारी प्रमाता श्रवण, मनन आदि का अभ्यास जारी रखता है। अतः ग्रन्थकार उनका विस्तृत वर्णन करते हैं- एवंभूतस्वस्वरूपचैतन्यसाक्षात्कारपर्यन्तं श्रवणमनननिदिध्यासन समाध्यनुष्ठानस्यापेक्षितत्वात्तेऽपि प्रदर्श्यन्ते। श्रवणं नाम षड्विधलिङ्गैरशेषवेदान्तानामद्वितीये वस्तुनि तात्पर्यावधारणम्। लिङ्गानि तूपक्रमोपसंहाराभ्यासापूर्वताफलार्थवादोपपत्त्याख्यानि। तत्र प्रकरणप्रति पाद्यस्यार्थस्य तदाद्यन्तयोरुपपादनमुपक्रमोपसंहारौ। यथा छान्दोग्ये