वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० वेदान्तसार षष्ठाध्याये प्रकरणप्रतिपाद्यस्याद्वितीयवस्तुन "एकमेवाद्वितीयं" इत्यादौ "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं" इत्यन्ते च प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य वस्तुनस्तन्मध्ये पौनःपुन्येन प्रतिपादनमभ्यासः। यथा तत्रैवाद्वितीयवस्तुनि मध्ये तत्त्वमसीति नवंकृत्वः प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्याद्वितीयवस्तुनः प्रमाणान्तराविषयीकरणमपूर्वता। यथा तत्रैवाद्वितीयवस्तुनो मानान्तराविषयीकरणम्। पदच्छेद-एवम्भूत-स्वरूपचैतन्य-साक्षात्कार-पर्यन्तम् श्रवण-मनन- निदिध्यासन-समाधि-अनुष्ठानस्य अपेक्षितत्वात् ते अपि प्रदर्श्यन्ते। श्रवणम् नाम- षड्विधलिङ्गैः अशेष-वेदान्तानाम् अद्वितीये वस्तुनि तात्पर्यवधारणम्। लिङ्गानि तु उपक्रम-उपसंहार-अभ्यास-अपूर्वता-फलार्थवाद-उपपत्ति- आख्यानि। तत्र प्रकरणप्रतिपाद्यस्य अर्थस्य तद् आद्यन्तयोः उपपादनम् उपक्रम-उपसंहारौ। यथा- छान्दोग्ये षष्ठ-अध्याये प्रकरणप्रतिपाद्यस्य अद्वितीय वस्तुनः "एकम् एव अद्वितीयम्" इत्यादौ "ऐतद् आत्म्यम् इदम् सर्वम्" इति अन्ते च प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य वस्तुनः तत् मध्ये पौनःपुन्येन प्रतिपादनम् अभ्यासः। यथा तत्र एव अद्वितीयवस्तुनि मध्ये 'तत्त्वमसि' इति नवकृत्वः प्रतिपादनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य अद्वितीयवस्तुनः प्रमाणान्तर अविषयीकरणम् अपूर्वता। यथा तत्रैव अद्वितीयवस्तुनः मानान्तर-अविषयीकरणम्।। अनुवाद-इसप्रकार अपने ही स्वरूप 'चैतन्य' के साक्षात्कार होने तक श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि आदि अनुष्ठानों के अपेक्षित होने के कारण वे भी प्रदर्शित किए जा रहे हैं। छः प्रकार के लक्षणों से युक्त, सम्पूर्ण वेदान्तसूत्रों का, अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में ही तात्पर्य है, यह निश्चय करना ही वस्तुतः श्रवण है। उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद तथा उपपत्ति नामक (ये) ही (छः) लिङ्ग हैं। उन छः लिङ्गों में प्रकरण में प्रतिपादन योग्य पदार्थ का, उसके प्रारम्भ एवं अन्त में प्रतिपादन करना (क्रमशः) उपक्रम एवं उपसंहार हैं। जिसप्रकार छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय में प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य अद्वितीयवस्तु 'एक ही अद्वैततत्त्व (ब्रह्म) के' प्रारम्भ में तथा 'यह सब कुछ वस्तुतः आत्मा का ही है' इसप्रकार अन्त में प्रतिपादन किया गया है।