वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाधि-निरूपण २७५ (४) रसास्वाद-रसास्वाद नामक विघ्न के ग्रन्थकार ने दो लक्षण किये हैं। प्रथम के अनुसार-अद्वितीयवस्तु ब्रह्म की प्राप्ति न होने पर सम्पूर्ण बाह्यप्रपञ्च की निवृत्ति होने से साधक को ब्रह्मानन्द के भ्रमवश जो सविकल्पक आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रसास्वाद कहते हैं। द्वितीय लक्षण के अनुसार-सविकल्पकसमाधि में स्थित साधक ज्यों ही निर्विकल्पक समाधि की ओर अग्रसर होता है। उसी समय अनुभूत आनन्द से अनिच्छावश ही संतुष्ट होकर ठहर जाता है। इसीको रसास्वाद नामक विघ्न कहा जाता है। विशेष-(1) पञ्चदशीकार ने रसास्वाद विघ्न की व्याख्या इसप्रकार की है- 'मग्नस्याब्धौ यथाक्षाणि विह्वलानि तथास्य धीः। अखण्डैकरसं श्रुत्वा निष्प्रचारा बिभेत्यतः॥ (२) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-६० विघ्न चतुष्टय ┌───────────────┬────────────────┬────────────────┬─────────────────┐ लय विक्षेप कषाय रसास्वाद │ │ │ │ ┌─────────────┐ ┌──────────────┐ ┌──────────────┐ ┌─────────────────┐ │निद्रावस्था को│ │बाह्य सांसारिक│ │वासनावश रागादि│ │भ्रमवश सविकल्पक │ │प्राप्त होना │ │विषयों से │ │से स्तब्ध होना│ │आनन्द से ही │ │ │ │अवरुद्ध होना │ │ │ │सन्तुष्ट हो जाना │ └─────────────┘ └───────▲──────┘ └──────▲───────┘ └────────▲────────┘ │ │ │ ┌─────┴─────────────┴─────────────────┴┐ │ अद्वितीय वस्तु के आश्रय │ │ से पूर्व चित्तवृत्ति का। │ └──────────────────────────────────────┘ अवतरणिका-तत्पश्चात् निर्विकल्पकसमाधि की स्थिति का कथन करते हुए, उससे पूर्व चित्तवृत्ति में विघ्नों का प्रादुर्भाव होने पर उनके निवारण- विषयक उपायों की कारिका प्रस्तुत करते हैं- अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितं चित्तं निर्वातदीपवदचलं सदखण्ड- चैतन्यमात्रमवतिष्ठते यदा तदा निर्विकल्पकः समाधिरित्युच्यते। तदुक्तम्- “लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः। सकषायं विजानीयाच्छमप्राप्तं न चालयेत्॥