वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ वेदान्तसार
नास्वादयेद्रसं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत्" इति, “यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता" इति च॥३३॥ पदच्छेद-अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितम् चित्तम् निर्वातदीपवत् अचलम् सद् अखण्डचैतन्यमात्रम् अवतिष्ठते यदा, तदा निर्विकल्पकः समाधिः इति उच्यते। तद उक्तम्- “लये सम्बोधयेत् चित्तम् विक्षिप्तम् शमयेत् पुनः। सकषायम् विजानीयात् शमप्राप्तम् न चालयेत्॥ न आस्वादयेद् रसम् तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत्" इति, “यथा दीपः निवातस्थः न इङ्गते सा उपमा स्मृता" इति च॥३३॥ अनुवाद-इन चार प्रकार के विघ्नों से पूर्णतय़ारहित चित्त, जब वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक के समान अचल होकर अखण्डचैतन्यमात्र में स्थित रहता है। तब निर्विकल्पकसमाधि है, ऐसा कहा जाता है। इसलिए कहा गया है- “लय में चित्त को सावधान करे, तत्पश्चात् (विक्षेप में) विक्षिप्त हुए (चित्त) को शान्त करे, कषाययुक्त चित्त को विशेषरूप से समझाए तथा स्थिरता (शम) को प्राप्त हुए चित्त को छेड़ना नहीं चाहिए। इसके अतिरिक्त 'रसास्वाद' (की स्थिति) में रस का आस्वादन न करे अपितु प्रज्ञा द्वारा (ठीक उसीप्रकार) स्वयं को पूर्णरूप से आसक्तिरहित करे। जिसप्रकार वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता है। वह साधक इसीप्रकार की उपमा वाला कहा गया है।" 'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड से पूर्व बताए गए लय, विक्षेप, कषाय एवं रसास्वाद नामक चार प्रकार के विघ्नों से पूर्णतय़ारहित होकर जब साधक, पूर्णतया वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक की पूर्णरूप से स्थिर लौ के समान, निश्चल एवं अखण्ड चैतन्यमात्ररूप में स्थित होता है, उसकी यही अवस्था निर्विकल्पकसमाधि कहलाती है। इस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करती हुई चित्तवृत्ति में यदि विघ्नों का प्रादुर्भाव हो जाता है, तो उसके निवारण के उपाय हेतु ग्रन्थकार आचार्य गौडपाद की कारिका को प्रस्तुत करते हैं- सविकल्पकसमाधि की अवस्था में प्रत्यगात्मारूप ब्रह्म के ज्ञान की प्रतीति न होने पर यदि आलस्य के कारण निद्रा की प्राप्तिरूप 'लय' नामक