वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाधि-निरूपण २७७ विघ्न आ जाए तो उसे दूर करने के लिए साधक को बार-बार चित्त को उत्साहित करके जागृत करना चाहिए, क्योंकि निद्रामग्न होने पर वह ब्रह्मप्राप्तिरूप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। पुनः अद्वितीय वस्तु ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए प्रवृत्त हुई चित्तवृत्ति यदि सांसारिकविषयों को ग्रहण करने में प्रवृत्त हो जाए, तो उसे सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्यभाव उत्पन्न करके शान्त करना चाहिए तथा धैर्य का अवलम्बन करके पुनः उसी अद्वितीयवस्तु परमब्रह्म की ओर प्रेरित करना चाहिए। ऐसा करने पर ही वह निर्विकल्पकसमाधि को प्राप्त करने में सक्षम होगा। इसप्रकार ब्रह्मेतर विषयों में लगा हुआ चित्त निरन्तर अभ्यासपूर्वक 'लय' और 'विक्षेप' नामक विघ्नों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् कभी-कभी अखण्डवस्तु के एकाकार की प्राप्ति न होने से स्तब्ध होकर जड़वत् हो जाता है अथवा रागादि वासनावश बाह्यविषयों की ओर जाने लगता है, तो कषायरूप इस विघ्न के उपस्थित होने पर साधक को सावधान हो जाना चाहिए तथा यह सोचकर कि, 'इसके द्वारा अखण्डवस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती है, अतः यह त्याज्य है', उसका परित्याग कर देना चाहिए। इसप्रकार विचार करने से निरन्तर अभ्यास द्वारा जब चित्त 'शम' को प्राप्त हो जाए तो उसे वहीं स्थिर कर देना चाहिए। उसके बाद उसे वहाँ से विचलित करना लेशमात्र भी उचित नहीं है। अतः स्वयं को प्रज्ञा द्वारा पूर्णतया आसक्तिरहित करके, साधक को ब्रह्मानन्द का आस्वादन करना चाहिए। वस्तुतः साधक को सविकल्पकरस के आनन्दमात्र से स्वयं को कृतार्थ नहीं समझना चाहिए, अपितु बुद्धिबल से सविकल्पक आनन्द से अनासक्त रहने का निरन्तर प्रयास करना चाहिए। इसप्रकार के योगी के चित्त की उपमा ऐसे दीपक की पूर्णतया स्थिर लौ के साथ दी गई है, जो पूरीतरह वायुरहित प्रदेश में रखा हुआ है। अर्थात् जिसप्रकार पूर्णतया वायुरहितप्रदेश में रखे हुए दीपक की लौ लेशमात्र भी परिचालित नहीं होती पूर्णतया निश्चल रहती है। ठीक उसीप्रकार सभीप्रकार के विघ्नों को पार करके निर्विकल्पकसमाधि में स्थित साधक का चित्त भी पूर्णतया निश्चल होकर अखण्डपरमानन्द का अनुभव करते हुए एकाकार की अनुभूति करता है। इस विषय में आचार्य गौडपाद कहते हैं-