भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 314 में से

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जीवन्मुक्त-निरूपण २८३ जीवन्मुक्त अज्ञान का विनाश हो जाने के कारण किए, जाने वाले कार्य के प्रति कर्तापन से अथवा भोग की जा रही वस्तु के प्रति भोक्ताभाव से पूर्णतया मुक्त होता है। इसलिए पूर्ववासना के कारण वर्तमानशरीर आदि से किए जाने वाले क्रियमाण एवं प्रारब्धकर्मों का वह साक्षिमात्र होता है, क्योंकि वह उनमें कर्तापन के अभिमान से रहित होता है। यद्यपि दूसरों की दृष्टि में वह इन सबका भोक्ता प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में उसकी स्थिति कमल के पत्ते पर स्थित जल की बूँद के समान होती है, जो पत्ते पर रखी हुई भी उसमें लिप्त नहीं होती है। इसीकारण वह रक्त एवं मांसादिपदार्थों द्वारा निर्मित मल-मूत्र आदि से भरे इस शरीर द्वारा, अन्धभाव, मन्दभाव आदि से युक्त श्रोत्रादि इन्द्रियसमूह से तथा शोक, मोह, भूख, प्यास आदि से व्याकुल हो जाने वाले अन्तःकरण द्वारा पूर्ववासना के प्रभाव के कारण किए जाने वाले कर्म तथा वर्तमानसमय में फलों की ओर उन्मुख प्रारब्धकर्मों के फलों के प्रति यथार्थस्थिति से पूर्णतया परिचित हो जाने के कारण, उन्हें सत्य नहीं मानता है। उन सभी कार्यों के प्रति उसकी मनःस्थिति को ग्रन्थकार एक उदाहरण द्वारा समझाते हैं- जीवन्मुक्त व्यक्ति क्रियमाण एवं प्रारब्धकर्मों को, उनके फलों को देखते हुए ठीक उसीप्रकार नहीं देखता है, जैसे- जादू को देखने वाला कोई व्यक्ति जादूगर की बातों को जादू समझकर 'यह वास्तविक नहीं है', इसप्रकार देखता हुआ भी नहीं देखता है, अर्थात् वह व्यक्ति उन कार्यों के प्रति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के अभिमान से पूर्णतया रहित रहता है, क्योंकि ज्ञान द्वारा उससे सम्बन्धित अज्ञान समाप्त हो जाता है। जबकि शरीर एवं इन्द्रियों के प्रति ममत्व एवं अहंभाव रखने के कारण बद्धव्यक्ति अपने अज्ञान के कारणशरीर एवं इन्द्रियों द्वारा किए जाने वाले कर्मों के प्रति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के अभिमान से युक्त रहता है। परिणामस्वरूप वह इनसे प्राप्त होने वाले अच्छे एवं बुरे फलों से भी बँध जाता है एवं उन्हें भोगने के लिए बार-बार विभिन्नशरीरों को धारण करके इस संसार में जन्म लेकर, आवागमन के चक्र में पड़ा सुख दुःख का भागी होता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मज्ञान होने पर तत्त्वज्ञानी तुरन्त शरीर का त्याग करके मोक्ष प्राप्त नहीं करता है, अपितु वस्त्र के जल जाने पर भी कुछ समय तक उसमें होने वाली वस्त्रविषयकबुद्धि के समान,

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