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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 314 में से

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पृष्ठ 298

२८४ वेदान्तसार भ्रमवश दिखायी देने वाले, दो चन्द्रमाओं की ज्ञाननिवृत्ति के समान अज्ञानवश प्रतीत होने वाले देहादि के मिथ्या होने का निश्चय होने पर भी पूर्वसंस्कारों के कारण प्रारब्धकर्मों के विनाशपर्यन्त उसके शरीर की स्थिति बनी रहती है। जो इस शरीर द्वारा फलभोग के उपरान्त ही समाप्त होते हैं। नित्यप्रति के दैनिककर्मों को यद्यपि जीवन्मुक्त व्यक्ति इसी शरीर द्वारा करता है, किन्तु उन सभी के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव के अभाव के कारण, वे उसके द्वारा किए जाते हुए भी न किए गए के समान ही रहते हैं, क्योंकि वह उनके कर्मफल से आबद्ध नहीं रहता है। इसी बात को ग्रन्थकार ‘स चक्षुरचक्षुरिव’ इत्यादि श्रुतिवचन को उद्धृत करते हुए परिपुष्ट करते हैं। जीवन्मुक्त नेत्र होते हुए भी देखता नहीं है, कान होते हुए भी सुनता नहीं है, इसका अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार जादूगर की क्रियाओं द्वारा अनेक वस्तुओं को उत्पन्न होते प्रत्यक्षतः देखते हुए भी हम यह कहते हैं कि यह सत्य नहीं है, दृष्टि का भ्रममात्र है। जले हुए वस्त्र को देखकर यह वस्त्र है, इस क्षणिकप्रतीति के साथ उसमें मिथ्यात्व का आभास भी रहता है। ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त इस संसार को देखता हुआ भी असत्य मानकर नहीं देखता है। वार्तालाप करता हुआ वाणी एवं श्रवणेन्द्रिय का प्रयोग करता हुआ भी नहीं करता है, क्योंकि इन सब क्रियाओं के प्रति उसमें कर्तापन एवं अहंभाव का पूर्णतया अभाव रहता है। इसके बाद ग्रन्थकार उपदेशसाहस्री में दिए गए श्लोक को उद्धृत करके जीवन्मुक्त के क्रियाकलाप को कहते हैं-“जो व्यक्ति ब्रह्म एवं आत्मा के एकत्व को भलीभांति समझ लेता है। सभीप्रकार के भेदभाव से रहित हुआ वह सुषुप्ति अवस्था के समान ही जाग्रत अवस्था में भी द्वैतभाव को समाप्त कर देता है। वस्तुतः इसप्रकार के व्यक्ति को ही आत्मज्ञानी कहा गया है।” इसे ‘अहं ब्रह्मास्मि’ एवं ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इत्यादि महावाक्यों की अनुभूति हो जाती है। इस कारण उसकी दृष्टि में ब्रह्म के अतिरिक्त सम्पूर्ण दृश्यमान चराचरजगत् एवं उसके कारण अज्ञान का पूर्णतया अभाव ही हो जाता है। इसलिए लोकव्यवहार में कर्मों को करता हुआ भी वह उन्हें नहीं करता है, क्योंकि कमल के पत्ते पर विराजमान जल की बूँद के समान, उन सभी कार्यों से वह सर्वथा अलिप्त रहता है। वस्तुतः वही व्यक्ति ब्रह्मवेत्ता, आत्मवेत्ता कहलाने का अधिकारी होता है, अन्य नहीं। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।