भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 314 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

जीवन्मुक्त-निरूपण २८५ विशेष-(1) जिसप्रकार धनुर्धारी द्वारा चलाए गए बाण में फेंकने वाले की शक्तिपर्यन्त वह भूमि पर नहीं गिरता है, ठीक उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों के फलभोगपर्यन्त जीवन्मुक्त का शरीर विनष्ट नहीं होता है। (2) 'व्युत्थान समये' से अभिप्राय ज्ञानप्राप्ति से होने वाली 'जाग्रति' रूप अर्थ से ग्रहण करना चाहिए। (3) शरीरनिर्माण में मांस-शोणित-मूत्रपुरीष आदि का उल्लेख शरीर के प्रति होने वाले वैराग्यभाव की अभिव्यक्ति हेतु सप्रयोजन किया गया है। (4) वेदान्त के अनुसार भूख एवं प्यास वस्तुतः प्राणों के कार्य हैं, किन्तु यहाँ उन्हें अन्तःकरण के कार्य कहा गया है। इसे विद्वानों ने सांख्य का प्रभाव माना है। (5) प्रस्तुत अंश में जीवन्मुक्त के क्रियाकलाप एवं सांसारिकव्यवहार के प्रति उसके चिन्तन का कथन करने के कारण 'बद्धव्यक्ति' के क्रियाकलापों की व्यञ्जना से प्रतीति हो रही है। (6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-६३ जीवन्मुक्त की दृष्टि (व्यवहार) शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण रुधिर मांस मलमूत्र मन्दत्व, अन्धत्व एवं शोक, मोह एवं भूख का पात्र कुण्ठत्व कापात्र प्यास का पात्र वैराग्य भाव सर्वत्र अद्वैतभाव का दर्शन इसके द्वारा किए जा रहे सर्वत्र अद्वैतभाव का दर्शन कार्यों के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव का अभाव अवतरणिका-पुनः अपने द्वारा किए गए कर्मों के प्रति जीवन्मुक्त द्वारा शुभ-अशुभ भावनाओं के अभाव को कहते हैं- अस्य ज्ञानात्पूर्वं विद्यमानानामेवाहारविहारादीनामनुवृत्तिवच्छुभ- वासनानामेवानुवृत्तिर्भवति शुभाशुभयोरौदासीन्यं वा। तदुक्तम्- “बुद्धाद्वैतसतत्त्वस्य यथेष्टाचरणं यदि। शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षण” इति। “ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतर” इति॥३६॥