वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ वेदान्तसार इन्होंने ब्रह्मविद्याभरण, शान्तिविवरण तथा गुरुप्रदीप आदि तीन ग्रन्थों की रचना की। इनमें ब्रह्मविद्याभरण ही प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसमें ब्रह्मसूत्र के चारों अध्यायों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इन्होंने अपने ग्रन्थों में प्रायः वाचस्पतिमिश्र के मत का ही अनुकरण किया है। (२९) श्रीहर्षमिश्र-श्रीहर्ष दार्शनिक और पण्डितकवि दोनों थे। इनके पिता का नाम श्रीहीरपण्डित तथा माता का नाम मामल्ल देवी था। माँ भगवती की उपासना के फलस्वरूप इन्हें पुत्ररत्न (श्रीहर्ष) की प्राप्ति हुई थी। ये अनन्य पितृभक्त तथा दृढ़प्रतिज्ञ थे। कहते हैं चिन्तामणिमन्त्र की सिद्धि के फलस्वरूप इन्हें समस्त विद्याओं में नैपुण्य तथा अद्भुत वाक्चातुर्य की प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् कान्यकुब्ज के राजा की सभा में जाकर इन्होंने शास्त्रार्थ करके राजपण्डितों को पराजित किया तथा राज्यानुकम्पा प्राप्त की। उनके आश्रयदाता राजा का नाम जयचन्द्र अथवा जयन्तचन्द्र था। श्रीहर्ष के समय में देश में न्यायदर्शन का विशेष प्रभाव था। साथ ही दक्षिण और उत्तरभारत में रामानुज एवं निम्बार्क के मतों का भी प्रचार हो रहा था। ऐसे समय में इन्होंने अपनी अपूर्वप्रतिभा द्वारा अद्वैतमत का समर्थन किया। न्यायमत का खण्डन करने हेतु उन्होंने 'खण्डनखण्डखाद्य' नामक अद्भुत एवं प्रौढ़ग्रन्थ की संरचना की। इनका दूसरा काव्यग्रन्थ 'नैषधचरित' है। इनमें इनके अपूर्व कवित्व एवं पाण्डित्य की अभिव्यक्ति हुई है। इनके अतिरिक्त उन्होंने अर्णववर्णन, शिवशक्तिसिद्धि, साहसाङ्कचम्पू, छन्दःप्रशस्ति, विजयप्रशस्ति, गौडोर्वीशकुलप्रशस्ति, ईश्वराभिसन्धि तथा स्थैर्यविचारणप्रकरण इत्यादि ग्रन्थों की भी संरचना की। अपने ग्रन्थों में उन्होंने विशेषरूप से उदयनाचार्य के न्यायमत का खण्डन करते हुए अद्वैतमत की स्थापना की है। उनके खण्डनखण्डखाद्य को 'अनिर्वचनीयसर्वस्व' के नाम से भी जाना जाता है। (३०) आनन्दबोधभट्टारकाचार्य-ये बारहवीं शताब्दी में विद्यमान थे। उन्होंने विभिन्नग्रन्थों से संग्रह करके 'न्यायमकरन्द' नामक ग्रन्थ की रचना की। तेरहवीं शताब्दी में विद्यमान चित्सुखाचार्य ने इस ग्रन्थ की व्याख्या प्रस्तुत की। ये संन्यासी थे। इनके जीवन की इससे अधिक कुछ बात ज्ञात नहीं है। इनके तीन ग्रन्थ प्राप्त होते हैं-(1) न्यायमकरन्द, (2) प्रमाण- माला (3) न्यायदीपावली। इन तीनों में ही इन्होंने अद्वैतमत का विवेचन किया है।