वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३३ ( ३१ ) आचार्य अमलानन्द– इनका आविर्भाव दक्षिणभारत में हुआ। इन्हें देवगिरि के राजा महादेव ( 1260 ई० से-1271 ई०) तथा राजा रामचन्द्र का समसामयिक माना जाता है। अतः इनका स्थितिकाल तेरहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध मानना उचित प्रतीत होता है। इनके गुरु का नाम अनुभवानन्द था। ये अद्वैतमत के समर्थक थे। इन्होंने तीन ग्रन्थों की रचना की–वेदान्तकल्पतरु, शास्त्रदर्पण तथा पञ्चपादिकादर्पण। इनमें से प्रथम में वाचस्पतिमिश्र की भामती टीका की व्याख्या की गई है। यह ग्रन्थ अद्वैतसिद्धान्त का प्रामाणिकग्रन्थ माना जाता है। द्वितीय में ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों की व्याख्या हुई है तथा तृतीय ग्रन्थ पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नामक ग्रन्थ की व्याख्या है। इन तीनों ग्रन्थों में भाषा प्राञ्जल तथा भावों की गम्भीरता देखने को मिलती है। ( ३२ ) चित्सुखाचार्य–बारहवीं एवं तेरहवीं शताब्दी भारतीय दार्शनिक इतिहास में खण्डन-मण्डन का युग रहा है। इस कालावधि में द्वैत-अद्वैतवादी न्यायमत के आचार्य परस्पर एक-दूसरे के सिद्धान्तों का खण्डन करने में लगे हुए थे। इन दिनों न्यायमत का प्रभाव बढ़ रहा था। अतः बारहवीं शती में श्रीहर्ष ने न्यायमत का खण्डन किया। पुनः तेरहवीं शती के आरम्भ में आचार्य गङ्गेश ने उनके मत को काटकर पुनः न्यायमत की प्रस्थापना की। इसीप्रकार द्वैतवादी वैष्णवाचार्य भी अद्वैतमत के खण्डन में लिप्त थे। ऐसे समय में चित्सुखाचार्य ने अद्वैतमत के समर्थन तथा न्याय आदि मतों का खण्डन करके शाङ्करमत की रक्षा की। एतदर्थ उन्होंने 'तत्त्वप्रदीपिका', 'न्यायमकरन्द' की टीका तथा खण्डनखण्डखाद्य की टीका लिखी। इनमें तत्त्वदीपिका का दूसरा नाम चित्सुखी भी है। इसके मङ्गलाचरण के अनुसार इनके गुरु का नाम 'ज्ञानोत्तम' था। इस ग्रन्थ में इन्होंने 12वीं शती में स्थित न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य के मत का खण्डन श्रीहर्ष के मत का उद्धरण देते हुए किया है। अतः इनका समय तेरहवीं शताब्दी माना गया है। ( ३३ ) आचार्य शङ्करानन्द–चौदहवीं शताब्दी में स्थित अद्वैतवादी आचार्य शङ्करानन्द, विद्यारण्यस्वामी के शिक्षागुरु थे, क्योंकि उन्होंने पञ्चदशी एवं विवरणप्रमेयसंग्रह के मङ्गलाचरण में इन्हें गुरुरूप में प्रणाम किया है। इन्होंने शाङ्करमत के प्रचारार्थ 'ब्रह्मसूत्रदीपिका', गीता की टीका तथा 108 उपनिषदों की टीका की संरचना की। इनके ग्रन्थों के अध्ययन से इनके