वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ वेदान्तसार ये अप्पयदीक्षित से पूर्ववर्ती हुए। साथ ही अपनी वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' में पञ्चदशी के उदाहरण प्रस्तुत करने के कारण विद्यारण्यस्वामी से परवर्ती सिद्ध होते हैं। इनके गुरु का नाम ज्ञानानन्द था। 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' वेदान्त का उत्कृष्टकोटि का प्रमाणग्रन्थ माना गया है। इसमें गद्य में विचार-विवेचन करते हुए पद्य में सिद्धान्त निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थ पर अप्पयदीक्षित ने 'सिद्धान्तदीपिकावृत्ति' का प्रणयन किया। (३७) आचार्य मल्लनाराध्य-इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में कोटीश वंश में हुआ। ये दक्षिणभारत के निवासी थे। इन्होंने द्वैतवादियों के मत का खण्डन करने के उद्देश्य से 'अद्वैतरत्न' तथा 'अभेदरत्न' नामक दो प्रकरणग्रन्थों की संरचना की। ये दोनों ग्रन्थ अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं। (३८) आचार्य नृसिंहाश्रम-अद्वैतसम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यों में इनकी गणना की जाती है। इनका स्थितिकाल सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना गया है, क्योंकि इन्होंने अपने 'तत्त्वविवेक' नामक ग्रन्थ का पूर्ण होने का समय सं० 1604 अर्थात् 1547 ई० बताया है। ये उद्भटदार्शनिक एवं प्रौढ़ पण्डित थे। इन्हीं की प्रेरणा से अप्पयदीक्षित ने परिमल, न्यायरक्षामणि तथा सिद्धान्तलेश आदि वेदान्तग्रन्थों की रचना की थी। इन्होंने 'भावप्रकाशिका' (प्रकाशात्मयतिकृत-पञ्चपादिकाविवरण की टीका), 'तत्त्वविवेक' एवं इसी पर स्वयं 'तत्त्वदीपन' टीका, भेदधिक्कार (भेदभाव का खण्डन); अद्वैतदीपिका (अद्वैतवेदान्त का युक्तिप्रधान ग्रन्थ), वैदिकसिद्धान्तसंग्रह (ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का ऐक्य प्रतिपादित) तथा तत्त्वबोधिनी (सर्वज्ञात्ममुनिकृत संक्षेपशारीरक की व्याख्या) इत्यादि ग्रन्थों की संरचना की। ये सभी उच्चकोटि के ग्रन्थ युक्तिप्रधान शैली में लिखे गए हैं। (३९) आचार्य रंगराजाध्वरी-ये सुप्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित के पिता थे। इनके पिता अद्वैत सम्प्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य दीक्षित थे। अनेक यज्ञों को सम्पादित कराने के कारण इन्हें 'दीक्षित' पदनाम से विभूषित किया गया। इनका मूलनाम वक्षःस्थलाचार्य था। ये काञ्ची के निवासी थे तथा विजयनगर के राजा कृष्णदेव के सभापण्डित थे। इन्होंने दो विवाह किए। इनमें पहली पत्नी शैवमतावलम्बी ब्राह्मण की पुत्री थी तथा दूसरी श्री