वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
३६ वेदान्तसार ये अप्पयदीक्षित से पूर्ववर्ती हुए। साथ ही अपनी वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' में पञ्चदशी के उदाहरण प्रस्तुत करने के कारण विद्यारण्यस्वामी से परवर्ती सिद्ध होते हैं। इनके गुरु का नाम ज्ञानानन्द था। 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' वेदान्त का उत्कृष्टकोटि का प्रमाणग्रन्थ माना गया है। इसमें गद्य में विचार-विवेचन करते हुए पद्य में सिद्धान्त निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थ पर अप्पयदीक्षित ने 'सिद्धान्तदीपिकावृत्ति' का प्रणयन किया। (३७) आचार्य मल्लनाराध्य-इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में कोटीश वंश में हुआ। ये दक्षिणभारत के निवासी थे। इन्होंने द्वैतवादियों के मत का खण्डन करने के उद्देश्य से 'अद्वैतरत्न' तथा 'अभेदरत्न' नामक दो प्रकरणग्रन्थों की संरचना की। ये दोनों ग्रन्थ अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं। (३८) आचार्य नृसिंहाश्रम-अद्वैतसम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यों में इनकी गणना की जाती है। इनका स्थितिकाल सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना गया है, क्योंकि इन्होंने अपने 'तत्त्वविवेक' नामक ग्रन्थ का पूर्ण होने का समय सं० 1604 अर्थात् 1547 ई० बताया है। ये उद्भटदार्शनिक एवं प्रौढ़ पण्डित थे। इन्हीं की प्रेरणा से अप्पयदीक्षित ने परिमल, न्यायरक्षामणि तथा सिद्धान्तलेश आदि वेदान्तग्रन्थों की रचना की थी। इन्होंने 'भावप्रकाशिका' (प्रकाशात्मयतिकृत-पञ्चपादिकाविवरण की टीका), 'तत्त्वविवेक' एवं इसी पर स्वयं 'तत्त्वदीपन' टीका, भेदधिक्कार (भेदभाव का खण्डन); अद्वैतदीपिका (अद्वैतवेदान्त का युक्तिप्रधान ग्रन्थ), वैदिकसिद्धान्तसंग्रह (ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का ऐक्य प्रतिपादित) तथा तत्त्वबोधिनी (सर्वज्ञात्ममुनिकृत संक्षेपशारीरक की व्याख्या) इत्यादि ग्रन्थों की संरचना की। ये सभी उच्चकोटि के ग्रन्थ युक्तिप्रधान शैली में लिखे गए हैं। (३९) आचार्य रंगराजाध्वरी-ये सुप्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित के पिता थे। इनके पिता अद्वैत सम्प्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य दीक्षित थे। अनेक यज्ञों को सम्पादित कराने के कारण इन्हें 'दीक्षित' पदनाम से विभूषित किया गया। इनका मूलनाम वक्षःस्थलाचार्य था। ये काञ्ची के निवासी थे तथा विजयनगर के राजा कृष्णदेव के सभापण्डित थे। इन्होंने दो विवाह किए। इनमें पहली पत्नी शैवमतावलम्बी ब्राह्मण की पुत्री थी तथा दूसरी श्री
भूमिका ३७ बैकुण्ठाचार्य वंश में उत्पन्न रंगमाचार्य की कन्या थी। इसका नाम तोतारम्बा देवी था। इनके चार पुत्रों में सबसे बड़े रंगराजाध्वरी थे। अप्ययदीक्षित ने अपने ग्रन्थों में पिता, पितामह तथा मातामह आदि का विस्तारपूर्वक परिचय दिया है। रंगराजाध्वरी सभी विद्याओं में निपुण थे। उनका पाण्डित्य असाधारण था। उन्होंने अपने पुत्र अप्ययदीक्षित को स्वयं विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान की। इस बात को अप्ययदीक्षित ने स्वयं स्वीकार किया है- तन्मूलानिह संग्रहेण कतिचित्सिद्धान्तभेदान्धियः। शुद्धयै सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचः ख्यापितान्॥ रंगराजाध्वरी ने 'अद्वैतविद्यामुकुर' तथा 'विवरणदर्पण' नामक अद्वैतमत का प्रतिपादन करने वाले दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की संरचना की। इसमें न्याय, वैशेषिक, सांख्य आदि मतों का खण्डन करके अद्वैतमत की स्थापना की गई है। (४०) आचार्य अप्ययदीक्षित-शङ्कराचार्य के परवर्ती विद्वानों में अद्वैत सम्प्रदाय की परम्परा में अप्ययदीक्षित का नाम अग्रगण्य है। ये आलंकारिक, वैयाकरण एवं धुरन्धर दार्शनिक थे। ये अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में हुए। इनका जन्म सन् 1550 ई० में हुआ। इनके पिता रंगराजाध्वरि तथा पितामह आचार्यदीक्षित थे। इनके छोटे भाई का नाम अच्छान दीक्षित था। यद्यपि इन्हें अपने पिता एवं पितामह से अद्वैतमत की शिक्षा प्राप्त हुई थी तथापि ये परम शिवभक्त थे। इन्हें विजयनगर राज्य के सभी राजाओं से अत्यधिक सम्मान प्राप्त हुआ। ये सिद्धान्तकौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु थे। कुछ समय तक ये दोनों साथ-साथ काशी में रहे। अपने मृत्युकाल में इन्होंने चिदम्बरम् जाने की इच्छा व्यक्त की। इनकी मृत्यु 72 वर्ष की आयु में सन् 1622 ई० में हुई। मृत्यु के समय इनके ग्यारह पुत्र तथा छोटे भाई के पौत्र नीलकण्ठदीक्षित पास ही उपस्थित थे। इन्होंने अलंकार, व्याकरण, मीमांसा, वेदान्त आदि विभिन्न विषयों पर लगभग 104 ग्रन्थों की रचना की। वे सभी वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं हैं। प्राप्य ग्रन्थों का यहाँ नामोल्लेख किया जा रहा है-(1) कुवलयानन्द ('चन्द्रालोक' नामक अलंकार ग्रन्थ की विस्तृत व्याख्या), (2) चित्रमीमांसा (अर्थचित्रविषयक ग्रन्थ), (3) वृत्तिवार्तिक (अभिधा, लक्षणा शब्दशक्ति विवेचन, (4) नामसंग्रहमाला (आलंकारिक कोश), (5) नक्षत्रवादावली
३८ वेदान्तसार (सत्ताईस संदिग्ध विषयों का विवेचन), (6) प्राकृतचन्द्रिका (प्राकृत शब्दानुशासन की आलोचना), (7) चित्रपुट, (8) विधिरसायन, (9) सुखोपयोजनी, (10) उपक्रमपराक्रम, (11) वादनक्षत्रमाला (सात से ग्यारह तक मीमांसाग्रन्थ), (12) परिमल (कल्पतरु की व्याख्या), (13) न्यायरक्षामणि (ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्याय की व्याख्या), (14) सिद्धान्तलेश (अद्वैतसम्प्रदाय के आचार्यों के मत निरूपण), (15) मतसारार्थसंग्रह (श्रीकण्ठ, शङ्कर, रामानुज आदि आचार्यों के मतों का परिचय 12 से 15 तक वेदान्तग्रन्थ), (16) न्यायमञ्जरी (शाङ्कर सिद्धान्तानुसारी), (17) न्याय मुक्तावली (मध्वमतानुसारी), (18) नियमयूथमालिका (रामानुजमतानुसारी), (19) शिवार्कमणिदीपिका, (20) रत्नत्रयपरीक्षा (श्रीकण्ठमतानुसारी), (21) मणिमालिका, (22) शिखरिणीमाला, (23) शिवतत्त्वविवेक, (24) ब्रह्मतर्कस्तव, (25) शिवार्चनचन्द्रिका, (26) शिवध्यानपद्धति, (27) आदित्यस्तवरत्न, (28) मध्वतन्त्रमुखमर्दन, (29) यादवाभ्युदय का भाष्य (21 से 29 तक सभी ग्रन्थ शैवमतानुसारी) इसके अतिरिक्त शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतविनिर्णय, पञ्चरत्नस्तव एवं उसकी व्याख्या, शिवानन्दलहरी, दुर्गाचन्द्रकलास्तुति एवं व्याख्या, कृष्णध्यानपद्धति व्याख्या सहित तथा आत्मार्पण आदि अनेक ग्रन्थ भी इनकी कृतियों में परिगणित हैं। इनके ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। मीमांसादर्शन के तो ये प्रकाण्डविद्वान् थे। शिवार्कमणिदीपिका से इनके न्याय, मीमांसा, व्याकरण तथा अलंकारशास्त्रविषयक प्रगाढ़पाण्डित्य की अभिव्यक्ति होती है। विद्वानों ने इन्हें एक जीववादी एवं बिम्ब-प्रतिबिम्बवादी कहकर इनका वैशिष्ट्य प्रतिपादित किया है। (४१) आचार्य भट्टोजिदीक्षित- ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थों में आचार्य पाणिनि के सूत्रों पर व्याख्यारूप में लिखा गया ग्रन्थ 'सिद्धान्तकौमुदी' तथा इसकी व्याख्या रूप में लिखा गया ग्रन्थ 'प्रौढमनोरमा' अत्यधिक प्रसिद्ध है। इनका तीसरा ग्रन्थ 'शब्दकौस्तुभ' है। जिसमें पातञ्जलमहाभाष्य के विषय का युक्तिपूर्वक समर्थन किया गया है। चतुर्थ ग्रन्थ 'वैयाकरणभूषण' है। इन व्याकरणग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने 'तत्त्वकौस्तुभ' एवं 'वेदान्ततत्त्वविवेकटीकाविवरण' नामक दो वेदान्तविषयक ग्रन्थों की भी संरचना की। इन दोनों ग्रन्थों में इन्होंने द्वैतवाद का खण्डन किया है।
भूमिका ३९ वेदान्तशास्त्र में ये आचार्य अप्पयदीक्षित के शिष्य थे तथा व्याकरणशास्त्र के गुरु प्रक्रियाप्रकाशकार श्रीकृष्णदीक्षित थे। ये असाधारण प्रतिभा के धनी थे। प्रौढ़मनोरमा में इन्होंने अद्भुत चातुर्यपूर्वक अपने गुरु के मत का खण्डन किया है। (४२) आचार्य सदाशिव ब्रह्मेन्द्र- ये काञ्ची कामकोटि पीठ के अधीश्वर एवं संन्यासी थे। इन्होंने अद्वैतविद्याविलास, बोधार्यात्मनिवेद, गुरुरत्नमालिका तथा ब्रह्मकीर्तनतरङ्गिणी नामक ग्रन्थों की रचना की। अद्वैतानन्दबोधेन्द्र के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। (४३) आचार्य नीलकण्ठसूरि- इनका जन्म महाराष्ट्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर कूर्पर नामक स्थान में हुआ। इनका स्थितिकाल 16वीं शताब्दी माना गया है। चतुर्धर वंश में उत्पन्न इनके पिता का नाम गोविन्दसूरि था। इनकी महाभारत पर लिखी गयी टीका 'भारतभावदीप' अत्यधिक प्रसिद्ध है। ये अद्वैतवादी आचार्य थे। गीता की व्याख्या के आरम्भ में इन्होंने शङ्कराचार्य एवं श्रीधरादि विद्वान् आचार्यों की श्रद्धापूर्वक वन्दना की है। (४४) आचार्य सदानन्दयोगीन्द्र- इनका स्थितिकाल विद्वानों ने सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध निर्धारित किया है। इन्होंने अद्वैतवेदान्त पर अत्यन्त सरलशैली में वेदान्तसार नामक प्रकरणग्रन्थ की रचना की। यह वस्तुतः सम्पूर्ण वेदान्तसिद्धान्तों का परिचायक ग्रन्थ है। साथ ही वेदान्तदर्शन के प्रारम्भिकज्ञान प्राप्त करने वाले जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। वेदान्तसार के मङ्गलाचरण में इन्होंने श्लेष के माध्यम से अपने गुरु अद्वयानन्द को नमन किया है। इस ग्रन्थ पर नृसिंहसरस्वती ने सुबोधिनी टीका, आपदेव ने बालबोधिनी तथा स्वामीरामतीर्थ ने विद्वन्मनोरञ्जनी टीकाओं की संरचना की। इनमें नृसिंह सरस्वती की सुबोधिनीटीका के अन्त में लिखे गए श्लोक में टीका का रचनाकाल शक संवत् 1518 बताया गया है। अतः स्पष्टरूप से कहा जा सकता है कि इससमय तक वेदान्तसार ने विद्वानों में पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक ग्रन्थ 'शङ्कर दिग्विजय' की भी रचना की, जो सम्प्रति अप्राप्य है। (४५) आचार्य नृसिंहसरस्वती-इन्होंने सन् 1596 ई० में आचार्य सदानन्द के प्रसिद्धग्रन्थ वेदान्तसार पर 'सुबोधिनी' नाम टीका की संरचना की। इसलिए इनका स्थितिकाल सोलहवीं शती का उत्तरार्द्ध माना गया है।
४० वेदान्तसार इनके गुरु का नाम कृष्णानन्दस्वामी था। इसी सुबोधिनीटीका के कारण वेदान्तजगत् में आचार्य नृसिंह को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इससे इनकी उच्चकोटि की प्रतिभा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। (४६) स्वामीरामतीर्थ-वेदान्तसार के द्वितीय टीकाकार हैं। इनका स्थितिकाल सत्रहवीं शताब्दी माना गया है। स्वामी कृष्णतीर्थ इनके गुरु थे। इन्होंने आचार्य सदानन्द के वेदान्तसार पर 'विद्वन्मनोरञ्जिनी' नामक टीका का प्रणयन किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'संक्षेपशारीरक' के ऊपर 'अन्वयार्थप्रकाशिका', शङ्कराचार्यकृत उपदेशसाहस्री पर 'पदयोजनिका' नामक टीकाएँ भी लिखीं एवं मैत्रायणी उपनिषद् पर भी इन्होंने एक टीका की संरचना की जो सम्भवतः उपलब्ध नहीं है। इनकी कृतियों के कारण वेदान्तजगत् में इनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। (४७) आचार्य आपदेव-मूलतः ये मीमांसक थे। इनके द्वारा विरचित 'मीमांसा न्यायप्रकाश' पूर्वमीमांसा का प्रामाणिक प्रकरणग्रन्थ माना जाता है, किन्तु मीमांसक होते हुए भी इन्होंने सदानन्द विरचित वेदान्तसार नामक प्रसिद्ध प्रकरणग्रन्थ के ऊपर 'बालबोधिनी' नामक सुन्दर टीका का प्रणयन किया। यह टीका वस्तुतः नृसिंहसरस्वती की 'सुबोधिनी, रामतीर्थकृत 'विद्वन्मनोरञ्जिनी' इन दोनों टीकाओं की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट मानी जाती है। कुछ विद्वान् इन्हें पूर्वमीमांसा का प्रौढ़विद्वान् होते हुए भी अद्वैतवादी मानते हैं। (४८) आचार्य मधुसूदनसरस्वती- इनका जन्म बंगप्रदेश में हुआ। ये फरीदपुर जिले के अन्तर्गत कोटालियापाडा नामक ग्राम के निवासी थे। ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे। इनके दीक्षागुरु का नाम विश्वेश्वरसरस्वती था। इन्हीं की प्रेरणा से इन्होंने दण्ड धारण किया। इनके विद्यागुरु माधवसरस्वती थे। विद्याध्ययन के अनन्तर इन्होंने काशी जाकर अनेक पण्डितों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। आचार्य मधुसूदनसरस्वती अद्वैतसम्प्रदाय के उद्भट विद्वान् थे। इनके युक्तिकौशल एवं उत्कृष्ट मेधासामर्थ्य के कारण इन्हें अद्वैतसाहित्य का युगनिर्माता भी कहा जाता है। इनके पूर्ववर्ती आचार्यों की युक्ति में शास्त्रप्रमाण प्रधान रहता था, किन्तु इन्होंने मुख्यरूप से अनुमानप्रमाण के बल पर ही अपने सिद्धान्त की स्थापना की है। अद्वैतसिद्धान्त का प्रधान स्तम्भ होते हुए भी इनकी कृतियों में सगुणभक्ति को अभिव्यक्ति मिली है।
भूमिका ४१ इसके अतिरिक्त इनके द्वारा विरचित 'भक्ति रसायन' नामक ग्रन्थ उनके अद्भुत भक्तिभाव का परिचायक है। इससे इनकी भगवद्रसज्ञता एवं भावुकता का परिचय प्राप्त होता है। इन्होंने अनेकग्रन्थों की संरचना की, जिनका संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है- (1) सिद्धान्तबिन्दु (शङ्कराचार्य विरचित 'दशश्लोकी' की व्याख्या), (2) संक्षेपशारीरक की व्याख्या (3) अद्वैतसिद्धि (चार परिच्छेदों में निबद्ध अद्वैतसिद्धान्त का उच्च कोटि का ग्रन्थ) (4) अद्वैतरत्नलक्षण (द्वैतवाद का खण्डन एवं अद्वैतवाद की स्थापना) (5) वेदान्तकल्पलतिका (वेदान्तग्रन्थ) (6) गूढार्थदीपिका (श्रीमद्भगवद्गीता की सर्वोत्तम व्याख्या) (7) प्रस्थान भेद (सभी शास्त्रों का सामञ्जस्य करके उनका अद्वैत में तात्पर्य प्रदर्शित किया है। यह ग्रन्थ लेखक की अद्भुत प्रतिभा का द्योतक है) (8) महिम्नस्तोत्र की टीका (प्रत्येक श्लोक की शिव एवं विष्णुपारक व्याख्या करके असाधारणकौशल प्रदर्शित किया है) (9) भक्तिरसायन (भक्ति- विषयक लक्षणग्रन्थ)। (४९) आचार्य धर्मराज अध्वरीन्द्र-इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी का आरम्भ माना गया है। इन्होंने 'वेदान्तपरिभाषा' नामक उत्कृष्ट एवं अद्वैतसिद्धान्त के लिए अत्यन्त उपयोगी प्रकरणग्रन्थ की रचना की। इसपर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं। अद्वैतवेदान्त के रहस्य को समझने के लिए इस ग्रन्थ का अध्ययन अत्यन्त उपयोगी है। इनके गुरु का नाम वेंकटनाथ था। इसके अतिरिक्त इन्होंने आचार्य गंगेशोपाध्यायकृत 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक नव्यन्याय के ग्रन्थ पर 'तर्कचूडामणि' नामक टीका भी लिखी। इसमें इन्होंने अपनी पूर्ववर्ती दश टीकाओं के मत का खण्डन किया है। (५०) आचार्य गोविन्दानन्द-इनका भी स्थितिकाल 17वीं शताब्दी रहा है। इनके विद्यागुरु शिवराम थे। उन्होंने शारीरकभाष्य पर 'रत्नप्रभा' नामक टीका लिखी। इसे शारीरकभाष्य की टीकाओं में सर्वाधिक सरल माना गया है। इस टीका में इन्होंने भाष्य के प्रायः प्रत्येक पद की व्याख्या प्रस्तुत की है। अतः यह टीका भाष्य को हृदयंगम कराने में सर्वाधिक उपयोगी है। ग्रन्थकार के अनुसार जो जिज्ञासु विस्तृत और गम्भीर टीकाओं को समझने में असमर्थ हैं, यह व्याख्या उन्हीं के लिए लिखी गयी है- विस्तृतग्रन्थवीक्षायामलसं यस्य मानसम्। व्याख्या तदर्थमारब्धा भाष्यरत्नप्रभाभिधा॥
४२ वेदान्तसार (५१) रामानन्दसरस्वती-ये स्वामी गोविन्दानन्द के शिष्य थे। अतः इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी माना गया है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र की शाङ्करभाष्यानुसारी 'ब्रह्मामृतवर्षिणी' नामक टीका का सरल भाषा में प्रणयन किया। इसके अतिरिक्त इनका दूसरा ग्रन्थ पद्मपादाचार्य की पञ्चपादिका पर प्रकाशात्मयति द्वारा लिखे गए 'विवरण' नामक ग्रन्थ पर 'विवरणोपन्यास' नामक व्याख्या है। इसकी तुलना विद्यारण्यस्वामी के 'विवरणप्रमेयसंग्रह' से की जा सकती है। इस ग्रन्थ में इन्होंने गद्य में विचार करने के उपरान्त फलरूप सिद्धान्त को पद्य में प्रस्तुत किया है। (५२) काश्मीरक सदानन्दयति- इन्होंने अद्वैतसिद्धि नामक प्रकरण ग्रन्थ का प्रणयन किया। ये काश्मीरप्रदेश के निवासी थे। इसलिए इनके नाम से पूर्व काश्मीरक शब्द का प्रयोग किया जाता है। इनका समय 17वीं शताब्दी माना गया है। प्रतिविम्बवाद एवं अवच्छिन्नवादविषयक विवादों की विवेचना में न पड़कर इन्होंने अपने ग्रन्थ में एकजीववाद को ही वेदान्त का मुख्यसिद्धान्त प्रतिपादित किया है, क्योंकि जिज्ञासु वस्तुतः प्रबल साधना द्वारा ऐकात्म्य का अनुभव करने तक ही वाग्जाल में फंसा रहता है। (५३) ब्रह्मानन्द सरस्वती-ये अद्वैतसिद्धि के टीकाकार एवं मधुसूदन सरस्वती के समकालीन आचार्य थे। इनकी गणना अद्वैतवाद के प्रमुख आचार्यों में की जाती है। इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी माना गया है। इनके दीक्षागुरु परमानन्दसरस्वती एवं विद्यागुरु नारायणतीर्थ थे। इसके अतिरिक्त इन्होंने शिवराम नामक व्यक्ति को भी अपनी लघुचन्द्रिका के अन्त में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक नमन किया है। इन्होंने व्यासराज के शिष्य रामाचार्य की 'तरङ्गिणी' के मत का खण्डन करने हेतु अद्वैतसिद्धि पर 'लघुचन्द्रिका' ग्रन्थ की संरचना की। इस ग्रन्थ से इनकी दार्शनिक प्रतिभा का सुन्दर परिचय प्राप्त होता है। इसमें रामाचार्य की सभी आपत्तियों का अत्यन्त सन्तोषजनक समाधान किया गया है। इन्होंने अपने ग्रन्थ में संसार का मिथ्यात्व, एकजीववाद, निर्गुणब्रह्मवाद, आनन्दरूपमुक्तिवाद इन सभी विषयों का सुन्दर विवेचन किया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने मधुसूदन के सिद्धान्त- बिन्दु पर 'रत्नावली' एवं 'सूत्रमुक्तावली' नामक दो ग्रन्थों की भी रचना की। (५४) आचार्य अच्युतकृष्णानन्द-ये कावेरी तट पर स्थित नीलकण्ठेश्वरम् नामक स्थान पर निवास करते थे तथा परम कृष्णभक्त थे। सिद्धान्तलेश पर लिखी इनकी टीका का नाम 'कृष्णालङ्कार' है। इससे इनके
भूमिका ४३ पाण्डित्य का अच्छा परिचय प्राप्त होता है। ये परमगुरुभक्त एवं विनम्र थे। इसके अतिरिक्त इन्होंने तैत्तिरीयोपनिषद् शाङ्करभाष्य पर 'वनमाला' नामक टीका की भी संरचना की। इससे भी इनकी कृष्णभक्ति का परिचय प्राप्त होता है। (५५) आचार्य महादेवसरस्वती- इनका समय 18वीं शताब्दी माना गया है। ये स्वयं प्रकाशानन्दसरस्वती के शिष्य थे। इन्होंने वेदान्तदर्शन पर तत्त्वानुसंधान नामक प्रकरणग्रन्थ की रचना करके उस पर स्वयं ही अद्वैत- चिन्ताकौस्तुभ नामक टीका का प्रणयन किया। 'तत्त्वानुसंधान' अद्वैतसिद्धान्त का ज्ञान कराने के लिए अत्यन्त सरलभाषा में लिखा गया ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ वेदान्त के आरम्भिक जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। (५६) आचार्य सदाशिवेन्द्र सरस्वती-इन्होंने 18वीं शताब्दी में करूर नामक स्थान पर जन्म ग्रहण किया। इनका अध्ययन ताञ्जोर जिले के तिरुविसानाल्लूर नामक स्थान पर हुआ। असाधारण प्रतिभा के धनी इनकी तार्किकशक्ति अत्यन्त तीक्ष्ण थी। ये असाधारण योगी थे। इनके दीक्षागुरु परमशिवेन्द्रसरस्वती थे। दक्षिणभारत में इनके जीवन की अनेक चमत्कारपूर्ण घटनाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि इन्होंने यूरोप में तुर्की तक भ्रमण किया था। नेरूर के पास इनकी समाधि आज भी बनी हुई है। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों पर शाङ्करभाष्यानुसारिणी 'ब्रह्मतत्त्व प्रकाशिका' नामक वृत्ति की संरचना की। बारह उपनिषदों पर टीका, योगसूत्रों पर 'योगसुधाकर' 'आत्मविद्याविलास' 'कविताकल्पवल्ली' तथा 'अद्वैतमञ्जरी' इत्यादि ग्रन्थों का भी इन्होंने प्रणयन किया। इनमें ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य को समझने के लिए 'ब्रह्मतत्त्वप्रकाशिका' अत्यन्त उपयोगी ग्रन्थ है। इनकी सभी रचना सरल एवं भावपूर्ण हैं। ये वस्तुतः महान् योगी एवं परम अद्वैतनिष्ठ सिद्ध महात्मा थे। (५७) आचार्य आयन्नदीक्षित- इनका स्थितिकाल 18वीं शताब्दी माना गया है। ये वेंकटेश के शिष्य थे। आचार्य वेंकटेश ने अक्षयषष्टि और दायशतक नामक दो ग्रन्थों का प्रणयन किया। जबकि आयन्नदीक्षित ने 'व्यासतात्पर्यनिर्णय' नामक केवल एक किन्तु अद्भुतग्रन्थ की रचना की। भगवान् वेदव्यास के वेदान्तसूत्रों की अलग-अलग विद्वानों ने अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैती, शुद्धाद्वैती, द्वैताद्वैती तथा शिवाद्वैती व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। इन मत सिद्धान्तों में पर्याप्त भिन्नता होते हुए भी सभी ने अपने-अपने सिद्धान्त को मूलसिद्धान्त के अधिक निकट बताया। ऐसी स्थिति में भगवान् वेदव्यास के
भूमिका: (ङ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त (ब्रह्म, माया, जीव, पञ्चकोश, महावाक्य)
अभिप्राय को ही समझना कठिन हो गया। आयन्नदीक्षित ने मौलिक युक्तियों को प्रस्तुत करते हुए व्यास के अद्वैत में ही मुख्यतात्पर्य-सिद्धि की। अद्वैतसिद्धान्त के प्रति रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए 'व्यास तात्पर्य निर्णय' वस्तुतः संग्रहणीय ग्रन्थ है।¹ यहाँ तक हमने वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्यों का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत किया। वस्तुतः वेदान्तदर्शन की शाखा-प्रशाखाओं के आचार्यों की सुदीर्घपरम्परा रही है। उनमें सभी का उल्लेख यहाँ सम्भव भी नहीं है। अन्वेषणपूर्वक इसके स्वतन्त्रलेखन एवं प्रकाशन की महती आवश्यकता है। जिससे अनेक अपरिचित, किन्तु महत्त्वपूर्ण आचार्यों एवं उनकी कृतियों से वेदान्तजगत् का परिचय हो सकेगा। (छ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त- (१) ब्रह्म-वेदान्तदर्शन और विशेषरूप से अद्वैतवेदान्त एकमात्र ब्रह्म को सत्य, नित्य एवं सर्वोपरि तत्त्व के रूप में मान्यता प्रदान करता है। इसीकारण इस दर्शन का प्रारम्भ ही 'ब्रह्मजिज्ञासा' से होता है (अथातो ब्रह्मजिज्ञासा-ब्रह्मसूत्र)। वस्तुतः इस परमतत्त्व ब्रह्म के ज्ञात हो जाने पर किसी अन्य वस्तु के ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं रहती है। अतः यहाँ इसका ज्ञान अत्यावश्यक माना गया है। 'बृहवृद्धौ' वृद्धि अर्थ में प्रयुक्त 'वृह्' धातु से 'मनिन्' प्रत्यय करके ब्रह्म शब्द निष्पन्न होता है। अर्थात् महान्, व्यापक, निरवधिक, निरतिशय महत्त्व से युक्त तत्त्व ही ब्रह्म है। 'बृंहणाद् ब्रह्म' इस व्युत्पत्ति के अनुसार देश, काल तथा वस्तु आदि से अपरिच्छिन्न नित्यतत्त्व ही ब्रह्म है।² इससे ब्रह्म के निरतिशय महत्त्व की स्पष्ट प्रतीति होती है। वेदान्तियों के अनुसार यह तत्त्व, प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द आदि प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता है, अपितु 'मैं हूँ' इसप्रकार के अनुभव का आधार ही इसकी सत्ता को सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त यहाँ श्रुति (वेद-उपनिषदादि) को ब्रह्म की सिद्धि में प्रबलप्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान की है। ब्रह्मतत्त्व का लक्षण करते हुए वेदान्तदर्शन कहता है कि जिसप्रकार उष्णता, लौहित्य एवं प्रकाश द्वारा दीपक का लक्षण किया जा
- वेदान्त के प्राचीन आचार्यों के विवरण हेतु महामहोपाध्याय पं० गोपीनाथकविराज के लेखों का ही यहाँ मुख्यरूप से प्रयोग किया गया है।
- ब्रह्मसूत्र (शांकरभाष्य) 1/1/1 पर रत्नप्रभा टीका।
भूमिका ४५
सकता है। ठीक उसीप्रकार सत्, चित् और आनन्द इन तीन शब्दों के माध्यम से ब्रह्म का स्वरूप प्रतिपादित किया जा सकता है। श्रुति वाक्य इस विषय में प्रमाण हैं- (1) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1) (2) विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (बृहदारण्यकोपनिषद्-3/9/28) (3) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्तिरीयोपनिषद्-3/6) छान्दोग्योपनिषद्कार का इस विषय में कथन है-सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (6/2/1) अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में एक अद्वितीय तत्त्व की सत्ता थी। वेदान्तदर्शन के अनुसार वह सत्ता केवल ब्रह्म की थी। इस प्रसंग में सत् की व्याख्या करते हुए आचार्य शङ्कर कहते हैं-सत् उसे कहा जाता है जो तीनों कालों में विद्यमान हो तथा ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जिसका अस्तित्व तीनों कालों में विद्यमान रहता है। यह न केवल सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान था, अपितु वर्तमान में भी इसकी स्थिति है और प्रलयकाल के पश्चात् भी रहेगा। यह वस्तुतः कालातीत यथार्थसत्ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म चिद्रूप है। जो ज्ञानवाची 'चिती संज्ञाने' धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसीलिए शङ्कराचार्य आदि विद्वानों ने इसे ज्ञानस्वरूप माना है। श्रुति इसे 'विज्ञान' शब्द के माध्यम से कहती है (विज्ञानमानन्दं ब्रह्म-बृहदा० 3/9/28)। विज्ञान शब्द का सामान्य अर्थ विशिष्ट या विशुद्धज्ञान भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्म विशुद्ध या विशिष्टज्ञानस्वरूप है। 'चित्' का एक अर्थ चैतन्य भी है, जिससे ब्रह्म का जडरहित होना अभिव्यक्त होता है। अतः संसार के सभी प्राणियों एवं वनस्पति आदि में जो चैतन्य प्रतीत होता है, वह चित्स्वरूप ब्रह्म के कारण ही है, क्योंकि सर्वव्यापक होने से उसकी सत्ता सम्पूर्णसृष्टि के कण-कण में है। कुछ विद्वानों ने 'चित्' शब्द का प्रकाश अर्थ भी किया है (स्वप्रकाशत्वं चित्त्वम्-ब्रह्मसूत्र भामतीटीका-वाचस्पतिमिश्र 1/1/1)। मुण्डकोपनिषद् ने ब्रह्म की ज्योतिषां ज्योतिः कहकर व्याख्या की है (मुण्डकोपनिषद्-2/2/9) इसप्रकार ब्रह्म के लिए प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य तथा स्वप्रकाशत्व आदि अर्थों को अभिव्यक्त करता है। इससे ब्रह्म की सत्ता, ज्ञानरूपता एवं स्वयंप्रकाशत्व आदि विशेषताएँ प्रकट होती हैं। ब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या में तीसरे 'आनन्द' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
४६ वेदान्तसार उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं वेदान्त के सभी ग्रन्थों में इसके इस स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई है। तैत्तिरीयोपनिषद् का इस विषय में स्पष्टरूप से कथन है—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (3/6)। यहाँ आनन्द शब्द ब्रह्म में आनन्द की प्रचुरता एवं पूर्णता को अभिव्यक्त करता है। बृहदारण्यकोपनिषद् ने भी ब्रह्म की 'सर्वोच्च आनन्द' कहकर व्याख्या की है-(4/3/32) इसके अतिरिक्त ब्रह्म के लिए 'अनन्तम्' पद का प्रयोग भी श्रुतियों ने किया है- (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1)। अनन्त का अभिप्राय है जिसका कोई अन्त अर्थात् सीमा न हो। अतः वह सर्वव्यापक, नित्य एवं सर्वात्मक है। वेदान्तदर्शन में ब्रह्म की बीजशक्ति के रूप में माया अथवा अविद्या का उल्लेख किया गया है। इसकी उपाधि से युक्त ब्रह्म ही 'ईश्वर' कहलाता है। यहाँ इसी ईश्वर को सम्पूर्ण चराचरजगत् की रचना का निमित्त और उपादानकारण माना गया है। अपनी प्रधानता की स्थिति में चैतन्यरूप ब्रह्म निमित्तकारण तथा अपनी उपाधि की प्रधानता की स्थिति में उपादानकरण होता है। ठीक उस मकड़ी के समान जो अपने शरीर के चैतन्य के कारण तन्तुजाल का निमित्तकारण होती है तथा शरीर से निकलने वाले तरलपदार्थ से तन्तुजाल का निर्माण करने से उपादानकारण भी है। यह दर्शन ब्रह्म को सर्वशक्तिमान मानता है। इसके अनुसार सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्म को किसी बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं होती है। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार 'जिसप्रकार जीवितपुरुष के शरीर से केश और रोम स्वतः उत्पन्न होते हैं, ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सम्पूर्ण चराचरजगत् उत्पन्न होता है।¹ इस जगत् की रचना करने के पश्चात् वह इसी में अनुप्रविष्ट हो जाता है।² इसीकारण एक होते हुए भी इसकी सभी यहाँ भूतों, पदार्थों एवं स्थानों में अर्थात् जगत् के कण-कण में सत्ता को स्वीकार किया गया है।³ वही यह प्राणियों के कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म का
- मुण्डकोपनिषद् 1/1/7
- तत् सृष्ट्वा तदैवानुप्राविशत् तैत्तिरीयोपनिषद् 2/6/1
- एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। (श्वेताश्वतरोपनिषद्, 6/11)
भूमिका ४७ साक्षी है तथा उन्हें कर्म का फल प्रदान करता है। शङ्कराचार्य के अनुसार 'इस संसाररूपी वृक्ष का मूल ब्रह्म ही है।' इसके अतिरिक्त ब्रह्म को यहाँ 'अवाङ्मनसगोचर' कहा गया है, क्योंकि उसे न तो आँखों से देखा जा सकता है, न ही मन और वाणी उसे जानने में समर्थ हैं। वह अत्यन्तसूक्ष्म होने के कारण अविज्ञेय है तथा अकथनीय है। फिर भी योगविद्या से योग्य गुरु के मार्गदर्शन में उसका साक्षात्कार किया जा सकता है, किन्तु उसके स्वरूप की व्याख्या असम्भव है। गूँगे के गुड़ के समान उसके आनन्द को केवल अनुभव किया जा सकता है। इसीकारण उपनिषदों में ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने के लिए 'नेति नेति' की शैली को अपनाया गया है। यहाँ 'नेति नेति' का दो बार प्रयोग माया एवं उसके प्रपञ्च का निराकरण करके एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को इंगित करने के लिए विशेष अभिप्राय हेतु किया गया है। वेदान्त के अनुसार-यद्यपि यह परमतत्त्व ब्रह्म एक है-'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' (छान्दोग्योपनिषद्-6/2/1), किन्तु पारमार्थिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से इसकी सगुण और निर्गुण दो रूपों में परिकल्पना की गई है। माया की उपाधि से विशिष्टब्रह्म ही ईश्वर सगुण, साकार या सविशेष कहा गया है तथा इससे रहित ब्रह्म ही निर्गुण, निराकार या निर्विशेष माना गया है। उपनिषदों में ब्रह्म का ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ आधार 'ओम्' या 'ओङ्कार' को माना गया है-'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षुभिः (ध्यानबिन्दूपनिषद्-2) इसका ध्यान करने से साधक ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म को मुक्तजीवों का आश्रय कहा गया है (मुण्डकोपनिषद्-2/2/8)। ब्रह्म का साक्षात्कार होने के पश्चात् साधक के हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं तथा उसके सभी संशय दूर हो जाते हैं। ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति ठीक उसीप्रकार ब्रह्म ही हो जाता है, जिसप्रकार बहती हुई नदियाँ समुद्र में मिलकर अपने नामरूप को खोकर उसमें एकाकार हो जाती हैं। ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करके व्यक्ति का पुनः इस संसार में आगमन नहीं होता है-'न स पुनरावर्तते'। इसीकारण ब्रह्म को आश्रय, अमृतमय एवं अविनश्वर कहा गया है। गीता ने भी इस बात का अनुमोदन किया है- अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ (श्रीमद्भगवद्गीता 8/21)
४८ वेदान्तसार
(२) आत्मा-वेदान्तदर्शन के प्रमाणरूप उपनिषद्ग्रन्थों में आत्मा के स्वरूप पर विशद चर्चा की गई है। यहाँ इसके लिए प्रायः उन्हीं विशेषणों का प्रयोग किया गया है, जो ब्रह्म के लिए प्रयुक्त हुए हैं। इस दृष्टि से इसे ब्रह्म का ही दूसरा नाम भी कहा जा सकता है। उपनिषदों में इसे 'अयमात्मा ब्रह्म' कहकर प्रत्यक्षतः स्वीकार भी किया गया है। ब्रह्म के समान ही आत्मा के अस्तित्व को भी 'मैं हूँ' अथवा 'मैं नहीं हूँ' इस अनुभव द्वारा स्वतः- सिद्ध माना गया है। इसके अनुसार-जिसप्रकार सूर्य को दिखाने के लिए दीपक की आवश्यकता नहीं होती है, ठीक उसीप्रकार आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है। इसीकारण बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने कहा-‘अरे विज्ञातारं केन विजानीयात्’ (2/4/14) अर्थात् 'जो सबको जानने वाला है उसे हम किस साधन द्वारा जान सकते हैं?' आत्मा भी ब्रह्म के समान ही सत्-चित् एवं आनन्दस्वरूप है। वर्तमान, भूत और भविष्यत तीनों कालों में अबाधितरूप में विद्यमान रहने के कारण इसे सत् कहा गया है।¹ साथ ही इस शब्द से इसके अमर, नित्य, शाश्वत, पुराण तथा अजन्मास्वरूप पर भी प्रकाश पड़ता है। आत्मा की यहाँ स्वयम्प्रकाशस्वरूप कहकर प्रशंसा की गई है। पञ्चदशीकार विद्यारण्यस्वामी ने आत्मा के इस वैशिष्ट्य को नृत्यशाला में रखे गए दीपक का उदाहरण देकर अत्यन्त सुंदर ढंग से प्रतिपादित किया है। तदनुसार- 'जिसप्रकार नृत्यशाला में रखा हुआ दीपक, नृत्यशाला के स्वामी, सहृदय सामाजिक, तथा नर्तकी को समानरूप से प्रकाशित करता है एवं स्वामी की अनुपस्थिति में भी स्वयं प्रदीप्त होता रहता है। ठीक उसीप्रकार यह साक्षीरूप आत्मा, अहंकार, बुद्धि एवं तत्तत् विषयों को प्रकाशित करता है तथा सुषुप्ति अवस्था में अहंकार आदि के विद्यमान न होने पर भी स्वयं प्रकाशित होता रहता है। इसके अतिरिक्त आत्मा को अच्छेद्य, अग्राह्य, अक्लेद्य तथा अशोष्य बताते हुए नित्य, सर्वव्यापी, स्थाणु, अचल एवं सनातन कहा गया है।²
- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (1/2/18)
- अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता-2/1/3)।
भूमिका ४९ अद्वैतवेदान्त के अनुसार आत्मा तीन प्रकार के शरीर-स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण एवं पाँच प्रकार के कोशों से अलग है, किन्तु जीव, अज्ञानवश एवं तादात्म्य के कारण शरीरत्रय तथा पञ्चकोशों को ही किसी न किसी रूप में आत्मा समझने लगता है। यह अविवेक ही उसके भवबन्धन का कारण बनता है। सद्गुरु के उपदेश द्वारा साधक आत्मा को इनसे अलग समझ लेता है तथा इस स्थिति में आत्मज्ञान होने पर वह ब्रह्म ही हो जाता है। इसी अभिप्राय को पञ्चदशीकार ने अत्यन्त सुन्दरढंग से इसप्रकार प्रस्तुत किया है- यथा मुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः। शरीरतृतीयाद्धीरैः परं ब्रह्मैव जायते॥ (पञ्चदशी 1/42) अर्थात् जिसप्रकार मूँज से इषिका (सिरकी) युक्तिपूर्वक निकाल ली जाती है। उसीप्रकार धीरपुरुष आत्मा को तीन प्रकार के शरीरों से पृथक् जान लेता है। उस स्थिति में वह परमब्रह्म हो जाता है। इसके अतिरिक्त उपनिषदों में आत्मा को विभु, सर्वगत, अत्यन्तसूक्ष्म, अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अखण्ड, शुद्ध, अन्तर्यामी, कूटस्थ, अविनाशी, विज्ञानघन, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव के रूप में भी वर्णित किया गया है।¹ अद्वैतवेदान्त के अनुयायियों ने आत्मा को 'परममहत्' परिमाण वाला माना है। साथ ही इन्होंने आत्मा में श्रुतिप्रमाणों एवं युक्तियों द्वारा एकत्व का प्रतिपादन किया है। यहाँ सांख्य के 'पुरुष बहुत्व' का यह कहकर खण्डन किया गया है कि जिसप्रकार एक अग्नि विभिन्न स्थानों एवं पदार्थों में अनेकरूपों में उद्भासित होता है, जबकि वास्तव में वह एक ही है। ठीक उसीप्रकार सभी प्राणियों में रहने वाला यह आत्मा भी एक ही है। अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ (कठो० 2/5/8) (3) माया (अज्ञान)- इसी का दूसरा नाम अज्ञान भी है। मायावाद अद्वैतवेदान्त का प्रमुख सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के आधार पर यह दर्शन 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का तात्त्विक एवं सारगर्भित विवेचन करता है। इस दृष्टि से इसे वेदान्तचिन्तन का मूल आधार भी कह सकते हैं। वेदान्त के
- कठोपनिषद्- 1/3/10-11, मुण्डकोपनिषद्-1/1/6, माण्डूक्योपनिषद्-6
५० वेदान्तसार ग्रन्थों में इसे भ्रान्ति, अविद्या, तमस्, मिथ्याज्ञान, विपर्ययमोह, अग्रहण तथा प्रकृति आदि नामों से अभिहित किया गया है। वस्तुतः वेदान्त की दृष्टि से माया, अविद्या तथा अज्ञान ये तीनों शब्द समानार्थक माने गए हैं। अतः एक ही अभिप्राय की अभिव्यक्ति करते हैं। श्रुति एवं स्मृति के आधार पर माया को अनादि, अनिर्वचनीय, भावरूप और मिथ्या कहा गया है। यह सत्त्व, रजस् एवं तमस् इन तीन गुणों के कारण त्रिगुणात्मिका है। इसकी आवरण एवं विक्षेप दो शक्तियाँ हैं। इनमें से प्रथम आवरणशक्ति वस्तु के यथार्थस्वरूप को आवृत कर लेती है तथा विक्षेपशक्ति द्वारा जगत् का निर्माण किया जाता है। अद्वैतवेदान्त के अर्वाचीन ग्रन्थों में 'माया' के स्थान पर 'अज्ञान' शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः हम उसी के आधार पर 'अज्ञान' के स्वरूप का प्रतिपादन कर रहे हैं- आचार्य सदानन्द के वेदान्तसार में 'अज्ञान' का लक्षण इस प्रकार किया गया है- “अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधी भावरूपं यत्किञ्चिदिति” अर्थात् अज्ञान सत् एवं असत् से भिन्न अर्थात् अनिर्वचनीय है। तीन गुणों वाला, ज्ञानविरोधी, भावरूप तथा 'कुछ है', इस स्वरूप वाला है। अतः इस लक्षण के आधार पर अज्ञान अथवा माया का विवेचन हम इसप्रकार कर सकते हैं- (अ) सदसद्भ्यामनिर्वचनीयम्-अज्ञान को सत् और असत् दोनों से भिन्न होने के कारण अनिर्वचनीय कहा गया है, क्योंकि यदि हम इसे सत् रूप मानें तो इसका ब्रह्म के समान बाध नहीं होना चाहिए। जबकि आत्मज्ञान होने पर इसकी निवृत्ति हो जाती है। इसलिए यह सत् नहीं हो सकता और यदि इसे असत् माना जाए तो वन्ध्यापुत्र के समान इसकी प्रतीति ही नहीं होनी चाहिए, जबकि किसी वस्तु के न जानने पर 'अहमज्ञः' इस रूप में हमें अनुभव वाक्यों द्वारा इसकी प्रतीति होती है। अतः अज्ञान को असद्रूप भी नहीं माना जा सकता है। परिणामस्वरूप सदसद् से विलक्षण होने के कारण इसे अनिर्वचनीय कहा गया है। माया अथवा अज्ञान की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन करते हुए शङ्कराचार्य कहते हैं- सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो।
भूमिका ५१ साङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा॥ (विवेक चूडामणि, 111) ‘अर्थात् माया न सत् है, न असत् है तथा सत्-असत् के रूप में उभयात्मक भी नहीं है। यह न साङ्ग है न अङ्गरहित है न उभयरूप ही है, अपितु यह अत्यन्त अद्भुत तथा अनिर्वचनीयरूप है।’ (ब) त्रिगुणात्मिका-वेदान्त, माया अथवा अज्ञान को सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से युक्त मानता है। जिसे यह श्रुति¹ स्मृति² एवं अनुभव के आधार पर सिद्ध करता है। सत्कार्यवाद के सिद्धान्त के अनुसार कार्य में दिखायी देने वाले गुण कारण में भी विद्यमान रहते हैं। अतः अज्ञान अथवा माया से उत्पन्न होने वाले तेज में लोहित, जल में शुक्ल तथा पृथिवी (अन्न) में कृष्ण गुण विद्यमानं हैं। वेदान्त इसी सिद्धान्त को मान्यता प्रदान करता है। इस विषय में छान्दोग्योपनिषद् में भी उल्लेख है- “यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्य” (6/4/1) अतः अज्ञान अथवा माया की त्रिगुणात्मकता सिद्ध होती है। (स) ज्ञानविरोधी-वेदान्तदर्शन तमोगुण-प्रधान आवरण एवं विक्षेप शक्तिद्वय से युक्त अज्ञान से उपहित (आवृत) चैतन्य अर्थात् ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति मानता है। अतः अज्ञान ही सृष्टि का मूलकारण है। यहाँ एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है, दृश्यमान यह सम्पूर्णजगत् मिथ्या है।³ अज्ञान ब्रह्म के साक्षात्कार में बाधक है। इसलिए इसे ज्ञानविरोधी कहा गया है, क्योंकि श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि साधनों का अनुष्ठान करता हुआ साधक जब ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है तो उसका अज्ञान निवृत्त हो जाता है। अतः माया अथवा अज्ञान को ज्ञान के माध्यम से बाधित किया जा सकता है। ठीक उसीप्रकार जैसे सूर्य के प्रकाश द्वारा अंधकार दूर हो जाता है। (द) भावरूप- अद्वैतवेदान्त अज्ञान को भावरूप स्वीकार करता है। इस विषय में चित्सुखाचार्य का कथन है- अनादि भावरूपं यद् विज्ञानेन विलीयते।
- देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् (श्वेताश्वतरोपनिषद्-1/3)।
- देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। (श्रीमद्भगवद्गीता 7/14)
- ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या।
५२ वेदान्तसार तदज्ञानमिति प्राज्ञा लक्षणं संप्रचक्षते॥ (चित्सुखी-1/9) अर्थात् अज्ञान अनादि और भावरूप है। इसकी भावरूपता इसी बात से सिद्ध होती है कि ज्ञान के उत्पन्न होने पर यह विलीन हो जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के आधार पर भी इसकी भावरूपता का प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि 'मैं अज्ञ हूँ', 'मैं किसी को नहीं जानता हूँ' इस रूप में प्रत्यक्ष-अनुभवप्रतीति ही अज्ञान की भावरूपता को सिद्ध करती है- प्रत्यक्षं तावदहमज्ञः, अन्यं च न जानामि इत्यपरोक्षावभासदर्शनात् (पञ्चपादिका विवरण-प्रकाशात्मयति-पृ० 74) इसीप्रकार अनुमान एवं अर्थापत्तिप्रमाण द्वारा भी इसकी भावरूपता का प्रतिपादन विद्वानों द्वारा किया गया है। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात् (श्वेताश्वतरो 4/10) इत्यादि श्रुतिवाक्य भी इसकी भावरूपता को ही सिद्ध करते हैं। (न) यत्किञ्चित्-यद्यपि अज्ञान त्रिगुणात्मक एवं भावरूप है तथापि इसके सम्बन्ध में 'इदमित्थम्' यह ऐसा ही है, यह नहीं कहा जा सकता है। इसीलिए वेदान्ताचार्यों ने 'यत्किञ्चित्' कहकर इसके स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वस्तुतः यही अज्ञान की विलक्षणता एवं अनिर्वचनीयता भी है। अधिकांश वेदान्ती ब्रह्म को अज्ञान का आश्रय मानते हैं। (४) अज्ञान के भेद-अद्वैतवेदान्त में उपाधिभेद के आधार पर व्यावहारिक दृष्टि से अज्ञान के दो भेद माने गए हैं (अ) समष्टिरूप अज्ञान (ब) व्यष्टिरूप अज्ञान। यहाँ समष्टि से अभिप्राय एक से है तथा व्यष्टि द्वारा अनेक में आशय ग्रहण किया गया है। जैसे-समष्टिरूप में कहने की इच्छा से वृक्षों के समूह को वन तथा व्यष्टिरूप में कथन की अभिलाषा से अलग-अलग वृक्ष को आम, जामुन, पीपल आदि शब्दों से व्यवहृत किया जाता है। इसीप्रकार समष्टिगत अनेक जलकणों के समूह को 'जलाशय' तथा व्यष्टिरूप में एक-एक जलकण अथवा वापी, कूप, तडाग आदि अनेक नामों से पृथक्-पृथक् व्यवहार करते हैं। ठीक उसीप्रकार अन्तःकरण की उपाधियों से नानारूप में प्रतीत हो रहे जीवगत अज्ञानों की समष्टि के अभिप्राय से अनेक अज्ञान इसप्रकार का व्यवहार किया जाता है। वास्तव में अज्ञान एक ही है। केवल उपाधिभेद के कारण उसके लिए एकत्व और अनेकत्व का व्यवहार होता है।
भूमिका ५३ (५) अज्ञान की शक्तियाँ-अज्ञान की आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियाँ मानी गई हैं। इनमें आवरणशक्ति द्वारा वस्तु के वास्तविक एवं सत्यरूप को आच्छादित कर दिया जाता है तथा विक्षेपशक्ति उसमें अनेक प्रकार के अवास्तविकरूपों का आभास कराती है। जिसे यहाँ रज्जु में सर्प की भ्रान्ति द्वारा समझाया गया है। तदनुसार अन्धकार में पड़ी हुई रस्सी में अज्ञान की प्रथम आवरणशक्ति द्वारा उसके वास्तविक एवं सत्यरूप रज्जु को पहले आच्छादित किया जाता है। तत्पश्चात् अज्ञान की द्वितीय विक्षेपशक्ति द्वारा अपने सामर्थ्य से उसमें अवास्तविक एवं असत्यरूप सर्प का आभास कराया जाता है। ठीक इसीप्रकार अज्ञान की आवरणशक्ति ब्रह्म अथवा आत्मा के वास्तविकस्वरूप को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् इसकी विक्षेपशक्ति द्वारा इसमें आकाशादि सृष्टिप्रपञ्च की उद्भावना कर दी जाती है। इसप्रकार सूक्ष्मशरीर से लेकर स्थूलब्रह्माण्ड पर्यन्त नामरूपात्मकजगत् की रचना इसी विक्षेपशक्ति द्वारा की जाती है। यह सम्पूर्णसृष्टि वस्तुतः पानी के बुलबुले के समान नाशवान् है। इसी आधार पर यहाँ 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का उद्घोष किया गया। इसके अतिरिक्त आत्मा को कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं सुखदुः खमोहात्मक इत्यादि सांसारिक तुच्छभावनाओं का अनुभव भी इसी विक्षेपशक्ति के कारण होता है। जिसप्रकार प्रकाश पड़ने पर व्यक्ति की सर्पविषयक कल्पना विलीन हो जाती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान होने पर जगत् की सत्य परिकल्पना एवं आत्मा के कर्तृत्व आदि की भावना भी विनष्ट हो जाती है। अतः आत्मा के कर्तृत्व की भावना संसार की वास्तविक प्रतीति दोनों ही रस्सी में सर्पत्व की भावना के समान पूर्णतया मिथ्या है। इसी अभिप्राय को भगवद्गीता में इसप्रकार कहा गया है- "न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः" (5/14) इसप्रकार यह स्पष्ट है कि अज्ञान आवरण एवं विक्षेपशक्ति द्वारा अपने आश्रय आत्मा अथवा ब्रह्म का बल प्राप्त करके उसके स्वयं प्रकाशत्व को आच्छादित कर उसमें ईश्वर, जीव, जगत् की आकृति के रूप में रज्जु में सर्प के समान मिथ्याप्रपञ्च की सृष्टि करता है।¹
- आच्छाद्य विक्षिपति संस्फुरदात्मरूपं जीवेश्वर जगदाकृतिभिर्मृषैव। 'अज्ञानमावरणविभ्रमशक्तियोगादात्मत्वमात्रविषयाश्रयताबलेन।। (संक्षेपशारीरक 1/20)
५४ वेदान्तसार इस प्रसङ्ग में एक प्रश्न स्वाभाविकरूप से उठता है कि स्वयंप्रकाश, चित्स्वरूप, अपरिच्छिन्न ब्रह्म अथवा आत्मा को जड़, परिच्छिन्न, अव्यापक अज्ञान द्वारा किसप्रकार आवृत किया जाता है? इस सम्बन्ध में वेदान्तशास्त्रियों ने अत्यन्त सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है-'अज्ञान की आवरणशक्ति सीमित होते हुए भी असीम आत्मा अथवा ब्रह्म को उसीप्रकार आवृत कर लेती है, जिसप्रकार विशाल आकार वाले प्रकाशपुञ्ज सूर्य को मेघ का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है। अज्ञानी व्यक्ति, मेघ द्वारा दृष्टि के आच्छन्न होने पर सूर्य को मेघ से ढका हुआ मानता है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति मुक्त आत्मा को बन्धनयुक्त समझता है- घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः। तथा बद्धवद् भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा।। (हस्तामलक-10) (६) ईश्वर- यह सामान्य सिद्धान्त है कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इसलिए सम्पूर्ण चराचरजगत् को देखकर यह अनुमान सहज ही किया जा सकता है कि इसका भी कोई कारण होना चाहिए, जिससे यह उत्पन्न हुआ है। वेदान्तदर्शन इस प्रपञ्च का कारण ईश्वर को स्वीकार करता है। अब प्रश्न उठता है कि यह ईश्वर क्या है? यद्यपि अद्वैतवेदान्त में एकमात्र चैतन्यतत्त्व परमब्रह्म की सत्ता को सर्वोपरि स्वीकार किया गया है, जो नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव तथा अविकारी है तथापि माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त एवं माया की उपाधि से विवर्जित इन दो भेदों को भी मान्यता प्रदान की गई है।¹ माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त होकर निर्गुण ब्रह्म ही सगुण बन जाता है। इसीको 'ईश्वर' संज्ञा दी गई है।² इसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता, अन्तर्यामी, जगत् का कारण एवं आनन्दमय माना गया है। ईश्वर के इन गुणों एवं विशेषणों का प्रतिपादन श्रुतिग्रन्थों में अनेकशः देखने को मिलता है।³
- द्विरूपं हि ब्रह्म अवगम्यते, नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम् (ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य- 1/1/11)
- तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत्। (पञ्चदशी-3/40)।
- मुण्डकोपनिषद्-1/1/9, कठोपनिषद्-2/3/3, श्रीमद्भगवद्गीता 18/61,
भूमिका ५५ इसी बात को हम इसप्रकार भी कह सकते हैं कि त्रिगुणात्मिका माया अथवा अज्ञान को शुद्ध-सत्त्वगुण की प्रधानता और अप्रधानता के आधार पर उत्कृष्ट उपाधि एवं निकृष्ट उपाधि के रूप में जाना जा सकता है। इसी विशुद्धसत्त्वप्रधान उत्कृष्ट उपाधिभूतसमष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य (परमब्रह्म) को ईश्वर तथा निष्कृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य को अद्वैतवेदान्त 'जीव' मानता है। यहाँ विशुद्धसत्त्वप्रधान से अभिप्राय रजोगुण एवं तमोगुण से अनभिभूत सत्त्वगुण की प्रधानता से ही ग्रहण करना चाहिए। यहाँ इसी ईश्वर को जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण माना गया है। ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। अपनी शक्ति द्वारा यह कुछ भी करने में समर्थ है, इसका कोई कारण नहीं है। वह अनादि है। ईश्वर की शक्ति अलौकिक है, क्योंकि हाथ न होने पर भी वह पदार्थों को ग्रहण कर सकता है, पैर न होने पर भी उसकी सर्वत्र गति है। वह आँख न होते हुए भी देखता है, कान न होते हुए भी सुनता है। वह सभी पदार्थों को जानता है किन्तु उसके यथार्थरूप को जानना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। सम्पूर्ण चराचररूप प्रपञ्चसमूह का साक्षीरूप में ज्ञाता होने के कारण ईश्वर को 'सर्वज्ञ' कहा गया है। सभी जीवों को उनके कर्म के अनुसार फल प्रदान करने वाला होने के कारण उसे सर्वेश्वर अथवा ईश्वर तथा सभी जीवों के हृदय के अन्दर स्थित होकर बुद्धि का नियामक होने से अन्तर्यामी तथा आनन्द की प्रचुरता होने के कारण इसे आनन्दमय कहा गया है। ईश्वर की अलौकिकशक्ति को अद्वैतवेदान्त में 'माया' कहा गया है। माया की शक्ति से युक्त ईश्वर सृष्टि की रचना में समर्थ होता है। यहाँ सृष्टि के प्रति ईश्वर को उपादान एवं निमित्तकारण दोनों माना गया है। जिसप्रकार एक मकड़ी तन्तुकार्य के प्रति अपनी प्रधानता से निमित्तकारण तथा अपनी उपाधि की प्रधानता से उपादानकारण होती है। उसीप्रकार ईश्वर भी चैतन्य की प्रधानता से सृष्टि का निमित्तकारण एवं मायारूप उपाधि से युक्त होने से उपादानकारण होता है। यह सृष्टि उत्पत्ति उसीप्रकार ईश्वर की बृहदारण्यकोपनिषद्-3/7/15)।