वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४१ इसके अतिरिक्त इनके द्वारा विरचित 'भक्ति रसायन' नामक ग्रन्थ उनके अद्भुत भक्तिभाव का परिचायक है। इससे इनकी भगवद्रसज्ञता एवं भावुकता का परिचय प्राप्त होता है। इन्होंने अनेकग्रन्थों की संरचना की, जिनका संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है- (1) सिद्धान्तबिन्दु (शङ्कराचार्य विरचित 'दशश्लोकी' की व्याख्या), (2) संक्षेपशारीरक की व्याख्या (3) अद्वैतसिद्धि (चार परिच्छेदों में निबद्ध अद्वैतसिद्धान्त का उच्च कोटि का ग्रन्थ) (4) अद्वैतरत्नलक्षण (द्वैतवाद का खण्डन एवं अद्वैतवाद की स्थापना) (5) वेदान्तकल्पलतिका (वेदान्तग्रन्थ) (6) गूढार्थदीपिका (श्रीमद्भगवद्गीता की सर्वोत्तम व्याख्या) (7) प्रस्थान भेद (सभी शास्त्रों का सामञ्जस्य करके उनका अद्वैत में तात्पर्य प्रदर्शित किया है। यह ग्रन्थ लेखक की अद्भुत प्रतिभा का द्योतक है) (8) महिम्नस्तोत्र की टीका (प्रत्येक श्लोक की शिव एवं विष्णुपारक व्याख्या करके असाधारणकौशल प्रदर्शित किया है) (9) भक्तिरसायन (भक्ति- विषयक लक्षणग्रन्थ)। (४९) आचार्य धर्मराज अध्वरीन्द्र-इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी का आरम्भ माना गया है। इन्होंने 'वेदान्तपरिभाषा' नामक उत्कृष्ट एवं अद्वैतसिद्धान्त के लिए अत्यन्त उपयोगी प्रकरणग्रन्थ की रचना की। इसपर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं। अद्वैतवेदान्त के रहस्य को समझने के लिए इस ग्रन्थ का अध्ययन अत्यन्त उपयोगी है। इनके गुरु का नाम वेंकटनाथ था। इसके अतिरिक्त इन्होंने आचार्य गंगेशोपाध्यायकृत 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक नव्यन्याय के ग्रन्थ पर 'तर्कचूडामणि' नामक टीका भी लिखी। इसमें इन्होंने अपनी पूर्ववर्ती दश टीकाओं के मत का खण्डन किया है। (५०) आचार्य गोविन्दानन्द-इनका भी स्थितिकाल 17वीं शताब्दी रहा है। इनके विद्यागुरु शिवराम थे। उन्होंने शारीरकभाष्य पर 'रत्नप्रभा' नामक टीका लिखी। इसे शारीरकभाष्य की टीकाओं में सर्वाधिक सरल माना गया है। इस टीका में इन्होंने भाष्य के प्रायः प्रत्येक पद की व्याख्या प्रस्तुत की है। अतः यह टीका भाष्य को हृदयंगम कराने में सर्वाधिक उपयोगी है। ग्रन्थकार के अनुसार जो जिज्ञासु विस्तृत और गम्भीर टीकाओं को समझने में असमर्थ हैं, यह व्याख्या उन्हीं के लिए लिखी गयी है- विस्तृतग्रन्थवीक्षायामलसं यस्य मानसम्। व्याख्या तदर्थमारब्धा भाष्यरत्नप्रभाभिधा॥