वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ वेदान्तसार (५१) रामानन्दसरस्वती-ये स्वामी गोविन्दानन्द के शिष्य थे। अतः इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी माना गया है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र की शाङ्करभाष्यानुसारी 'ब्रह्मामृतवर्षिणी' नामक टीका का सरल भाषा में प्रणयन किया। इसके अतिरिक्त इनका दूसरा ग्रन्थ पद्मपादाचार्य की पञ्चपादिका पर प्रकाशात्मयति द्वारा लिखे गए 'विवरण' नामक ग्रन्थ पर 'विवरणोपन्यास' नामक व्याख्या है। इसकी तुलना विद्यारण्यस्वामी के 'विवरणप्रमेयसंग्रह' से की जा सकती है। इस ग्रन्थ में इन्होंने गद्य में विचार करने के उपरान्त फलरूप सिद्धान्त को पद्य में प्रस्तुत किया है। (५२) काश्मीरक सदानन्दयति- इन्होंने अद्वैतसिद्धि नामक प्रकरण ग्रन्थ का प्रणयन किया। ये काश्मीरप्रदेश के निवासी थे। इसलिए इनके नाम से पूर्व काश्मीरक शब्द का प्रयोग किया जाता है। इनका समय 17वीं शताब्दी माना गया है। प्रतिविम्बवाद एवं अवच्छिन्नवादविषयक विवादों की विवेचना में न पड़कर इन्होंने अपने ग्रन्थ में एकजीववाद को ही वेदान्त का मुख्यसिद्धान्त प्रतिपादित किया है, क्योंकि जिज्ञासु वस्तुतः प्रबल साधना द्वारा ऐकात्म्य का अनुभव करने तक ही वाग्जाल में फंसा रहता है। (५३) ब्रह्मानन्द सरस्वती-ये अद्वैतसिद्धि के टीकाकार एवं मधुसूदन सरस्वती के समकालीन आचार्य थे। इनकी गणना अद्वैतवाद के प्रमुख आचार्यों में की जाती है। इनका स्थितिकाल 17वीं शताब्दी माना गया है। इनके दीक्षागुरु परमानन्दसरस्वती एवं विद्यागुरु नारायणतीर्थ थे। इसके अतिरिक्त इन्होंने शिवराम नामक व्यक्ति को भी अपनी लघुचन्द्रिका के अन्त में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक नमन किया है। इन्होंने व्यासराज के शिष्य रामाचार्य की 'तरङ्गिणी' के मत का खण्डन करने हेतु अद्वैतसिद्धि पर 'लघुचन्द्रिका' ग्रन्थ की संरचना की। इस ग्रन्थ से इनकी दार्शनिक प्रतिभा का सुन्दर परिचय प्राप्त होता है। इसमें रामाचार्य की सभी आपत्तियों का अत्यन्त सन्तोषजनक समाधान किया गया है। इन्होंने अपने ग्रन्थ में संसार का मिथ्यात्व, एकजीववाद, निर्गुणब्रह्मवाद, आनन्दरूपमुक्तिवाद इन सभी विषयों का सुन्दर विवेचन किया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने मधुसूदन के सिद्धान्त- बिन्दु पर 'रत्नावली' एवं 'सूत्रमुक्तावली' नामक दो ग्रन्थों की भी रचना की। (५४) आचार्य अच्युतकृष्णानन्द-ये कावेरी तट पर स्थित नीलकण्ठेश्वरम् नामक स्थान पर निवास करते थे तथा परम कृष्णभक्त थे। सिद्धान्तलेश पर लिखी इनकी टीका का नाम 'कृष्णालङ्कार' है। इससे इनके