वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४३ पाण्डित्य का अच्छा परिचय प्राप्त होता है। ये परमगुरुभक्त एवं विनम्र थे। इसके अतिरिक्त इन्होंने तैत्तिरीयोपनिषद् शाङ्करभाष्य पर 'वनमाला' नामक टीका की भी संरचना की। इससे भी इनकी कृष्णभक्ति का परिचय प्राप्त होता है। (५५) आचार्य महादेवसरस्वती- इनका समय 18वीं शताब्दी माना गया है। ये स्वयं प्रकाशानन्दसरस्वती के शिष्य थे। इन्होंने वेदान्तदर्शन पर तत्त्वानुसंधान नामक प्रकरणग्रन्थ की रचना करके उस पर स्वयं ही अद्वैत- चिन्ताकौस्तुभ नामक टीका का प्रणयन किया। 'तत्त्वानुसंधान' अद्वैतसिद्धान्त का ज्ञान कराने के लिए अत्यन्त सरलभाषा में लिखा गया ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ वेदान्त के आरम्भिक जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। (५६) आचार्य सदाशिवेन्द्र सरस्वती-इन्होंने 18वीं शताब्दी में करूर नामक स्थान पर जन्म ग्रहण किया। इनका अध्ययन ताञ्जोर जिले के तिरुविसानाल्लूर नामक स्थान पर हुआ। असाधारण प्रतिभा के धनी इनकी तार्किकशक्ति अत्यन्त तीक्ष्ण थी। ये असाधारण योगी थे। इनके दीक्षागुरु परमशिवेन्द्रसरस्वती थे। दक्षिणभारत में इनके जीवन की अनेक चमत्कारपूर्ण घटनाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि इन्होंने यूरोप में तुर्की तक भ्रमण किया था। नेरूर के पास इनकी समाधि आज भी बनी हुई है। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों पर शाङ्करभाष्यानुसारिणी 'ब्रह्मतत्त्व प्रकाशिका' नामक वृत्ति की संरचना की। बारह उपनिषदों पर टीका, योगसूत्रों पर 'योगसुधाकर' 'आत्मविद्याविलास' 'कविताकल्पवल्ली' तथा 'अद्वैतमञ्जरी' इत्यादि ग्रन्थों का भी इन्होंने प्रणयन किया। इनमें ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य को समझने के लिए 'ब्रह्मतत्त्वप्रकाशिका' अत्यन्त उपयोगी ग्रन्थ है। इनकी सभी रचना सरल एवं भावपूर्ण हैं। ये वस्तुतः महान् योगी एवं परम अद्वैतनिष्ठ सिद्ध महात्मा थे। (५७) आचार्य आयन्नदीक्षित- इनका स्थितिकाल 18वीं शताब्दी माना गया है। ये वेंकटेश के शिष्य थे। आचार्य वेंकटेश ने अक्षयषष्टि और दायशतक नामक दो ग्रन्थों का प्रणयन किया। जबकि आयन्नदीक्षित ने 'व्यासतात्पर्यनिर्णय' नामक केवल एक किन्तु अद्भुतग्रन्थ की रचना की। भगवान् वेदव्यास के वेदान्तसूत्रों की अलग-अलग विद्वानों ने अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैती, शुद्धाद्वैती, द्वैताद्वैती तथा शिवाद्वैती व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। इन मत सिद्धान्तों में पर्याप्त भिन्नता होते हुए भी सभी ने अपने-अपने सिद्धान्त को मूलसिद्धान्त के अधिक निकट बताया। ऐसी स्थिति में भगवान् वेदव्यास के