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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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अभिप्राय को ही समझना कठिन हो गया। आयन्नदीक्षित ने मौलिक युक्तियों को प्रस्तुत करते हुए व्यास के अद्वैत में ही मुख्यतात्पर्य-सिद्धि की। अद्वैतसिद्धान्त के प्रति रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए 'व्यास तात्पर्य निर्णय' वस्तुतः संग्रहणीय ग्रन्थ है।¹ यहाँ तक हमने वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्यों का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत किया। वस्तुतः वेदान्तदर्शन की शाखा-प्रशाखाओं के आचार्यों की सुदीर्घपरम्परा रही है। उनमें सभी का उल्लेख यहाँ सम्भव भी नहीं है। अन्वेषणपूर्वक इसके स्वतन्त्रलेखन एवं प्रकाशन की महती आवश्यकता है। जिससे अनेक अपरिचित, किन्तु महत्त्वपूर्ण आचार्यों एवं उनकी कृतियों से वेदान्तजगत् का परिचय हो सकेगा। (छ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त- (१) ब्रह्म-वेदान्तदर्शन और विशेषरूप से अद्वैतवेदान्त एकमात्र ब्रह्म को सत्य, नित्य एवं सर्वोपरि तत्त्व के रूप में मान्यता प्रदान करता है। इसीकारण इस दर्शन का प्रारम्भ ही 'ब्रह्मजिज्ञासा' से होता है (अथातो ब्रह्मजिज्ञासा-ब्रह्मसूत्र)। वस्तुतः इस परमतत्त्व ब्रह्म के ज्ञात हो जाने पर किसी अन्य वस्तु के ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं रहती है। अतः यहाँ इसका ज्ञान अत्यावश्यक माना गया है। 'बृहवृद्धौ' वृद्धि अर्थ में प्रयुक्त 'वृह्' धातु से 'मनिन्' प्रत्यय करके ब्रह्म शब्द निष्पन्न होता है। अर्थात् महान्, व्यापक, निरवधिक, निरतिशय महत्त्व से युक्त तत्त्व ही ब्रह्म है। 'बृंहणाद् ब्रह्म' इस व्युत्पत्ति के अनुसार देश, काल तथा वस्तु आदि से अपरिच्छिन्न नित्यतत्त्व ही ब्रह्म है।² इससे ब्रह्म के निरतिशय महत्त्व की स्पष्ट प्रतीति होती है। वेदान्तियों के अनुसार यह तत्त्व, प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द आदि प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता है, अपितु 'मैं हूँ' इसप्रकार के अनुभव का आधार ही इसकी सत्ता को सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त यहाँ श्रुति (वेद-उपनिषदादि) को ब्रह्म की सिद्धि में प्रबलप्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान की है। ब्रह्मतत्त्व का लक्षण करते हुए वेदान्तदर्शन कहता है कि जिसप्रकार उष्णता, लौहित्य एवं प्रकाश द्वारा दीपक का लक्षण किया जा


  1. वेदान्त के प्राचीन आचार्यों के विवरण हेतु महामहोपाध्याय पं० गोपीनाथकविराज के लेखों का ही यहाँ मुख्यरूप से प्रयोग किया गया है।
  2. ब्रह्मसूत्र (शांकरभाष्य) 1/1/1 पर रत्नप्रभा टीका।