वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४५
सकता है। ठीक उसीप्रकार सत्, चित् और आनन्द इन तीन शब्दों के माध्यम से ब्रह्म का स्वरूप प्रतिपादित किया जा सकता है। श्रुति वाक्य इस विषय में प्रमाण हैं- (1) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1) (2) विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (बृहदारण्यकोपनिषद्-3/9/28) (3) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्तिरीयोपनिषद्-3/6) छान्दोग्योपनिषद्कार का इस विषय में कथन है-सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (6/2/1) अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में एक अद्वितीय तत्त्व की सत्ता थी। वेदान्तदर्शन के अनुसार वह सत्ता केवल ब्रह्म की थी। इस प्रसंग में सत् की व्याख्या करते हुए आचार्य शङ्कर कहते हैं-सत् उसे कहा जाता है जो तीनों कालों में विद्यमान हो तथा ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जिसका अस्तित्व तीनों कालों में विद्यमान रहता है। यह न केवल सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान था, अपितु वर्तमान में भी इसकी स्थिति है और प्रलयकाल के पश्चात् भी रहेगा। यह वस्तुतः कालातीत यथार्थसत्ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म चिद्रूप है। जो ज्ञानवाची 'चिती संज्ञाने' धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसीलिए शङ्कराचार्य आदि विद्वानों ने इसे ज्ञानस्वरूप माना है। श्रुति इसे 'विज्ञान' शब्द के माध्यम से कहती है (विज्ञानमानन्दं ब्रह्म-बृहदा० 3/9/28)। विज्ञान शब्द का सामान्य अर्थ विशिष्ट या विशुद्धज्ञान भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्म विशुद्ध या विशिष्टज्ञानस्वरूप है। 'चित्' का एक अर्थ चैतन्य भी है, जिससे ब्रह्म का जडरहित होना अभिव्यक्त होता है। अतः संसार के सभी प्राणियों एवं वनस्पति आदि में जो चैतन्य प्रतीत होता है, वह चित्स्वरूप ब्रह्म के कारण ही है, क्योंकि सर्वव्यापक होने से उसकी सत्ता सम्पूर्णसृष्टि के कण-कण में है। कुछ विद्वानों ने 'चित्' शब्द का प्रकाश अर्थ भी किया है (स्वप्रकाशत्वं चित्त्वम्-ब्रह्मसूत्र भामतीटीका-वाचस्पतिमिश्र 1/1/1)। मुण्डकोपनिषद् ने ब्रह्म की ज्योतिषां ज्योतिः कहकर व्याख्या की है (मुण्डकोपनिषद्-2/2/9) इसप्रकार ब्रह्म के लिए प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य तथा स्वप्रकाशत्व आदि अर्थों को अभिव्यक्त करता है। इससे ब्रह्म की सत्ता, ज्ञानरूपता एवं स्वयंप्रकाशत्व आदि विशेषताएँ प्रकट होती हैं। ब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या में तीसरे 'आनन्द' शब्द का प्रयोग किया जाता है।