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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 314 में से

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४० वेदान्तसार इनके गुरु का नाम कृष्णानन्दस्वामी था। इसी सुबोधिनीटीका के कारण वेदान्तजगत् में आचार्य नृसिंह को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इससे इनकी उच्चकोटि की प्रतिभा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। (४६) स्वामीरामतीर्थ-वेदान्तसार के द्वितीय टीकाकार हैं। इनका स्थितिकाल सत्रहवीं शताब्दी माना गया है। स्वामी कृष्णतीर्थ इनके गुरु थे। इन्होंने आचार्य सदानन्द के वेदान्तसार पर 'विद्वन्मनोरञ्जिनी' नामक टीका का प्रणयन किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'संक्षेपशारीरक' के ऊपर 'अन्वयार्थप्रकाशिका', शङ्कराचार्यकृत उपदेशसाहस्री पर 'पदयोजनिका' नामक टीकाएँ भी लिखीं एवं मैत्रायणी उपनिषद् पर भी इन्होंने एक टीका की संरचना की जो सम्भवतः उपलब्ध नहीं है। इनकी कृतियों के कारण वेदान्तजगत् में इनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। (४७) आचार्य आपदेव-मूलतः ये मीमांसक थे। इनके द्वारा विरचित 'मीमांसा न्यायप्रकाश' पूर्वमीमांसा का प्रामाणिक प्रकरणग्रन्थ माना जाता है, किन्तु मीमांसक होते हुए भी इन्होंने सदानन्द विरचित वेदान्तसार नामक प्रसिद्ध प्रकरणग्रन्थ के ऊपर 'बालबोधिनी' नामक सुन्दर टीका का प्रणयन किया। यह टीका वस्तुतः नृसिंहसरस्वती की 'सुबोधिनी, रामतीर्थकृत 'विद्वन्मनोरञ्जिनी' इन दोनों टीकाओं की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट मानी जाती है। कुछ विद्वान् इन्हें पूर्वमीमांसा का प्रौढ़विद्वान् होते हुए भी अद्वैतवादी मानते हैं। (४८) आचार्य मधुसूदनसरस्वती- इनका जन्म बंगप्रदेश में हुआ। ये फरीदपुर जिले के अन्तर्गत कोटालियापाडा नामक ग्राम के निवासी थे। ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे। इनके दीक्षागुरु का नाम विश्वेश्वरसरस्वती था। इन्हीं की प्रेरणा से इन्होंने दण्ड धारण किया। इनके विद्यागुरु माधवसरस्वती थे। विद्याध्ययन के अनन्तर इन्होंने काशी जाकर अनेक पण्डितों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। आचार्य मधुसूदनसरस्वती अद्वैतसम्प्रदाय के उद्भट विद्वान् थे। इनके युक्तिकौशल एवं उत्कृष्ट मेधासामर्थ्य के कारण इन्हें अद्वैतसाहित्य का युगनिर्माता भी कहा जाता है। इनके पूर्ववर्ती आचार्यों की युक्ति में शास्त्रप्रमाण प्रधान रहता था, किन्तु इन्होंने मुख्यरूप से अनुमानप्रमाण के बल पर ही अपने सिद्धान्त की स्थापना की है। अद्वैतसिद्धान्त का प्रधान स्तम्भ होते हुए भी इनकी कृतियों में सगुणभक्ति को अभिव्यक्ति मिली है।