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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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भूमिका ३९ वेदान्तशास्त्र में ये आचार्य अप्पयदीक्षित के शिष्य थे तथा व्याकरणशास्त्र के गुरु प्रक्रियाप्रकाशकार श्रीकृष्णदीक्षित थे। ये असाधारण प्रतिभा के धनी थे। प्रौढ़मनोरमा में इन्होंने अद्भुत चातुर्यपूर्वक अपने गुरु के मत का खण्डन किया है। (४२) आचार्य सदाशिव ब्रह्मेन्द्र- ये काञ्ची कामकोटि पीठ के अधीश्वर एवं संन्यासी थे। इन्होंने अद्वैतविद्याविलास, बोधार्यात्मनिवेद, गुरुरत्नमालिका तथा ब्रह्मकीर्तनतरङ्गिणी नामक ग्रन्थों की रचना की। अद्वैतानन्दबोधेन्द्र के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। (४३) आचार्य नीलकण्ठसूरि- इनका जन्म महाराष्ट्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर कूर्पर नामक स्थान में हुआ। इनका स्थितिकाल 16वीं शताब्दी माना गया है। चतुर्धर वंश में उत्पन्न इनके पिता का नाम गोविन्दसूरि था। इनकी महाभारत पर लिखी गयी टीका 'भारतभावदीप' अत्यधिक प्रसिद्ध है। ये अद्वैतवादी आचार्य थे। गीता की व्याख्या के आरम्भ में इन्होंने शङ्कराचार्य एवं श्रीधरादि विद्वान् आचार्यों की श्रद्धापूर्वक वन्दना की है। (४४) आचार्य सदानन्दयोगीन्द्र- इनका स्थितिकाल विद्वानों ने सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध निर्धारित किया है। इन्होंने अद्वैतवेदान्त पर अत्यन्त सरलशैली में वेदान्तसार नामक प्रकरणग्रन्थ की रचना की। यह वस्तुतः सम्पूर्ण वेदान्तसिद्धान्तों का परिचायक ग्रन्थ है। साथ ही वेदान्तदर्शन के प्रारम्भिकज्ञान प्राप्त करने वाले जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। वेदान्तसार के मङ्गलाचरण में इन्होंने श्लेष के माध्यम से अपने गुरु अद्वयानन्द को नमन किया है। इस ग्रन्थ पर नृसिंहसरस्वती ने सुबोधिनी टीका, आपदेव ने बालबोधिनी तथा स्वामीरामतीर्थ ने विद्वन्मनोरञ्जनी टीकाओं की संरचना की। इनमें नृसिंह सरस्वती की सुबोधिनीटीका के अन्त में लिखे गए श्लोक में टीका का रचनाकाल शक संवत् 1518 बताया गया है। अतः स्पष्टरूप से कहा जा सकता है कि इससमय तक वेदान्तसार ने विद्वानों में पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक ग्रन्थ 'शङ्कर दिग्विजय' की भी रचना की, जो सम्प्रति अप्राप्य है। (४५) आचार्य नृसिंहसरस्वती-इन्होंने सन् 1596 ई० में आचार्य सदानन्द के प्रसिद्धग्रन्थ वेदान्तसार पर 'सुबोधिनी' नाम टीका की संरचना की। इसलिए इनका स्थितिकाल सोलहवीं शती का उत्तरार्द्ध माना गया है।