भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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३८ वेदान्तसार (सत्ताईस संदिग्ध विषयों का विवेचन), (6) प्राकृतचन्द्रिका (प्राकृत शब्दानुशासन की आलोचना), (7) चित्रपुट, (8) विधिरसायन, (9) सुखोपयोजनी, (10) उपक्रमपराक्रम, (11) वादनक्षत्रमाला (सात से ग्यारह तक मीमांसाग्रन्थ), (12) परिमल (कल्पतरु की व्याख्या), (13) न्यायरक्षामणि (ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्याय की व्याख्या), (14) सिद्धान्तलेश (अद्वैतसम्प्रदाय के आचार्यों के मत निरूपण), (15) मतसारार्थसंग्रह (श्रीकण्ठ, शङ्कर, रामानुज आदि आचार्यों के मतों का परिचय 12 से 15 तक वेदान्तग्रन्थ), (16) न्यायमञ्जरी (शाङ्कर सिद्धान्तानुसारी), (17) न्याय मुक्तावली (मध्वमतानुसारी), (18) नियमयूथमालिका (रामानुजमतानुसारी), (19) शिवार्कमणिदीपिका, (20) रत्नत्रयपरीक्षा (श्रीकण्ठमतानुसारी), (21) मणिमालिका, (22) शिखरिणीमाला, (23) शिवतत्त्वविवेक, (24) ब्रह्मतर्कस्तव, (25) शिवार्चनचन्द्रिका, (26) शिवध्यानपद्धति, (27) आदित्यस्तवरत्न, (28) मध्वतन्त्रमुखमर्दन, (29) यादवाभ्युदय का भाष्य (21 से 29 तक सभी ग्रन्थ शैवमतानुसारी) इसके अतिरिक्त शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतविनिर्णय, पञ्चरत्नस्तव एवं उसकी व्याख्या, शिवानन्दलहरी, दुर्गाचन्द्रकलास्तुति एवं व्याख्या, कृष्णध्यानपद्धति व्याख्या सहित तथा आत्मार्पण आदि अनेक ग्रन्थ भी इनकी कृतियों में परिगणित हैं। इनके ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। मीमांसादर्शन के तो ये प्रकाण्डविद्वान् थे। शिवार्कमणिदीपिका से इनके न्याय, मीमांसा, व्याकरण तथा अलंकारशास्त्रविषयक प्रगाढ़पाण्डित्य की अभिव्यक्ति होती है। विद्वानों ने इन्हें एक जीववादी एवं बिम्ब-प्रतिबिम्बवादी कहकर इनका वैशिष्ट्य प्रतिपादित किया है। (४१) आचार्य भट्टोजिदीक्षित- ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थों में आचार्य पाणिनि के सूत्रों पर व्याख्यारूप में लिखा गया ग्रन्थ 'सिद्धान्तकौमुदी' तथा इसकी व्याख्या रूप में लिखा गया ग्रन्थ 'प्रौढमनोरमा' अत्यधिक प्रसिद्ध है। इनका तीसरा ग्रन्थ 'शब्दकौस्तुभ' है। जिसमें पातञ्जलमहाभाष्य के विषय का युक्तिपूर्वक समर्थन किया गया है। चतुर्थ ग्रन्थ 'वैयाकरणभूषण' है। इन व्याकरणग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने 'तत्त्वकौस्तुभ' एवं 'वेदान्ततत्त्वविवेकटीकाविवरण' नामक दो वेदान्तविषयक ग्रन्थों की भी संरचना की। इन दोनों ग्रन्थों में इन्होंने द्वैतवाद का खण्डन किया है।