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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 314 में से

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भूमिका ४९ अद्वैतवेदान्त के अनुसार आत्मा तीन प्रकार के शरीर-स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण एवं पाँच प्रकार के कोशों से अलग है, किन्तु जीव, अज्ञानवश एवं तादात्म्य के कारण शरीरत्रय तथा पञ्चकोशों को ही किसी न किसी रूप में आत्मा समझने लगता है। यह अविवेक ही उसके भवबन्धन का कारण बनता है। सद्गुरु के उपदेश द्वारा साधक आत्मा को इनसे अलग समझ लेता है तथा इस स्थिति में आत्मज्ञान होने पर वह ब्रह्म ही हो जाता है। इसी अभिप्राय को पञ्चदशीकार ने अत्यन्त सुन्दरढंग से इसप्रकार प्रस्तुत किया है- यथा मुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः। शरीरतृतीयाद्धीरैः परं ब्रह्मैव जायते॥ (पञ्चदशी 1/42) अर्थात् जिसप्रकार मूँज से इषिका (सिरकी) युक्तिपूर्वक निकाल ली जाती है। उसीप्रकार धीरपुरुष आत्मा को तीन प्रकार के शरीरों से पृथक् जान लेता है। उस स्थिति में वह परमब्रह्म हो जाता है। इसके अतिरिक्त उपनिषदों में आत्मा को विभु, सर्वगत, अत्यन्तसूक्ष्म, अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अखण्ड, शुद्ध, अन्तर्यामी, कूटस्थ, अविनाशी, विज्ञानघन, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव के रूप में भी वर्णित किया गया है।¹ अद्वैतवेदान्त के अनुयायियों ने आत्मा को 'परममहत्' परिमाण वाला माना है। साथ ही इन्होंने आत्मा में श्रुतिप्रमाणों एवं युक्तियों द्वारा एकत्व का प्रतिपादन किया है। यहाँ सांख्य के 'पुरुष बहुत्व' का यह कहकर खण्डन किया गया है कि जिसप्रकार एक अग्नि विभिन्न स्थानों एवं पदार्थों में अनेकरूपों में उद्भासित होता है, जबकि वास्तव में वह एक ही है। ठीक उसीप्रकार सभी प्राणियों में रहने वाला यह आत्मा भी एक ही है। अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ (कठो० 2/5/8) (3) माया (अज्ञान)- इसी का दूसरा नाम अज्ञान भी है। मायावाद अद्वैतवेदान्त का प्रमुख सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के आधार पर यह दर्शन 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का तात्त्विक एवं सारगर्भित विवेचन करता है। इस दृष्टि से इसे वेदान्तचिन्तन का मूल आधार भी कह सकते हैं। वेदान्त के

  1. कठोपनिषद्- 1/3/10-11, मुण्डकोपनिषद्-1/1/6, माण्डूक्योपनिषद्-6