वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें५० वेदान्तसार ग्रन्थों में इसे भ्रान्ति, अविद्या, तमस्, मिथ्याज्ञान, विपर्ययमोह, अग्रहण तथा प्रकृति आदि नामों से अभिहित किया गया है। वस्तुतः वेदान्त की दृष्टि से माया, अविद्या तथा अज्ञान ये तीनों शब्द समानार्थक माने गए हैं। अतः एक ही अभिप्राय की अभिव्यक्ति करते हैं। श्रुति एवं स्मृति के आधार पर माया को अनादि, अनिर्वचनीय, भावरूप और मिथ्या कहा गया है। यह सत्त्व, रजस् एवं तमस् इन तीन गुणों के कारण त्रिगुणात्मिका है। इसकी आवरण एवं विक्षेप दो शक्तियाँ हैं। इनमें से प्रथम आवरणशक्ति वस्तु के यथार्थस्वरूप को आवृत कर लेती है तथा विक्षेपशक्ति द्वारा जगत् का निर्माण किया जाता है। अद्वैतवेदान्त के अर्वाचीन ग्रन्थों में 'माया' के स्थान पर 'अज्ञान' शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः हम उसी के आधार पर 'अज्ञान' के स्वरूप का प्रतिपादन कर रहे हैं- आचार्य सदानन्द के वेदान्तसार में 'अज्ञान' का लक्षण इस प्रकार किया गया है- “अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधी भावरूपं यत्किञ्चिदिति” अर्थात् अज्ञान सत् एवं असत् से भिन्न अर्थात् अनिर्वचनीय है। तीन गुणों वाला, ज्ञानविरोधी, भावरूप तथा 'कुछ है', इस स्वरूप वाला है। अतः इस लक्षण के आधार पर अज्ञान अथवा माया का विवेचन हम इसप्रकार कर सकते हैं- (अ) सदसद्भ्यामनिर्वचनीयम्-अज्ञान को सत् और असत् दोनों से भिन्न होने के कारण अनिर्वचनीय कहा गया है, क्योंकि यदि हम इसे सत् रूप मानें तो इसका ब्रह्म के समान बाध नहीं होना चाहिए। जबकि आत्मज्ञान होने पर इसकी निवृत्ति हो जाती है। इसलिए यह सत् नहीं हो सकता और यदि इसे असत् माना जाए तो वन्ध्यापुत्र के समान इसकी प्रतीति ही नहीं होनी चाहिए, जबकि किसी वस्तु के न जानने पर 'अहमज्ञः' इस रूप में हमें अनुभव वाक्यों द्वारा इसकी प्रतीति होती है। अतः अज्ञान को असद्रूप भी नहीं माना जा सकता है। परिणामस्वरूप सदसद् से विलक्षण होने के कारण इसे अनिर्वचनीय कहा गया है। माया अथवा अज्ञान की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन करते हुए शङ्कराचार्य कहते हैं- सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो।