भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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५८ वेदान्तसार प्रसंगवश यहां संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं- इनमें प्रथम अवस्था में जीव मन एवं इन्द्रियों के माध्यम से बाह्यपदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इस स्थिति में उसका स्थूलशरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सचेष्ट रहते हैं। अन्नमयकोष से आबद्ध हुआ वह सांसारिकपदार्थों का उपभोग करता है। आचार्य गौडपाद ने जीव को इस अवस्था में बाह्यविषयों को प्रकाशित करने वाला अर्थात् बहिष्प्रज्ञ एवं स्थूलभुक् कहा है।¹ द्वितीय, स्वप्नावस्था में जीव का शरीर और इन्द्रियाँ विश्राम करती हैं, किन्तु उसका मन क्रियाशील रहता है। इस अवस्था में जीव का सूक्ष्मशरीर से सम्बन्ध होता है तथा वह मनोमय, प्राणमय एवं विज्ञानमय इन तीन कोशों से आबद्ध रहता है। वेदान्ताचार्यों ने इसे अन्तःप्रज्ञ एवं प्रविविक्तभुक् संज्ञा प्रदान की है। मन की वासना के अनुरूप कार्य करने के कारण इसे अन्तःप्रज्ञ भी कहा गया है। तृतीय, सुषुप्ति अवस्था में जीव न तो किसीप्रकार की कामना करता है और न ही कोई स्वप्न देखता है, क्योंकि उसके स्थूलदेह, इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदि कार्य नहीं करते हैं। जाग्रत एवं स्वप्नावस्था में जीव आनन्द के साथ दुःख का भी अनुभव करता है, किन्तु इस अवस्था में केवल आनन्द की प्रचुरता रहती है। अतः उसे 'आनन्दभुक्' कहा जाता है। इस अवस्था में जीव चैतन्य से प्रदीप्त अज्ञानवृत्ति की प्रधानता से युक्त हुआ 'चेतोमुख' भी कहलाता है। प्रसुप्त अवस्था में बुद्धि उसीप्रकार स्थित रहती है, जिसप्रकार वट के बीज में वट का वृक्ष छिपा रहता है। यह आनन्दमयकोष से आबद्ध अवस्था है। चतुर्थ, तुरीय अवस्था में सभीप्रकार के प्रपञ्चों का उपशम हो जाता है। इसमें जीव न अन्तःप्रज्ञ रहता है, न बहिष्प्रज्ञ और न ही उभयप्रज्ञ। यह उसका शान्त, शिव एवं अद्वैतरूप माना गया है। सभीप्रकार के दुःखों की निवृत्ति होकर कार्यकारणभाव समाप्त हो जाता है। साथ ही वासना-बीजों का भी नाश हो जाता है। सभी कोशों से मुक्त होकर जीव इस अवस्था में ब्रह्ममय बन जाता है। अनादि माया अथवा अज्ञान उसका साथ छोड़ देता है तथा उसे पूर्णतया अवबुद्ध एवं अद्वैतभाव की प्राप्ति होती है।

  1. माण्डूक्योपनिषद्, आगमप्रकरण-3