वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५९
(९) जगत्-अद्वैतवेदान्त जगत् को मिथ्या प्रतिपादित करता है-“ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या" ब्रह्म अथवा आत्मज्ञान न होने की स्थिति तक ही यह जगत् हमें सत्य प्रतीत होता है। उसकी यह प्रतीति सीप में चाँदी अथवा रज्जु में सर्प के समान मानी गई है, क्योंकि इसकी सत्ता आत्मज्ञान न होने की स्थिति पर्यन्त ही रहती है। जिसप्रकार अज्ञान की निवृत्ति होने पर सीपी और रज्जु हमें अपने वास्तविकरूप में प्रतीत होते हैं, ठीक उसीप्रकार ब्रह्मबोध होने पर जगत् का मिथ्यात्व स्वतःसिद्ध हो जाता है। वेदान्त सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को मानता है। उसकी दृष्टि में यह जगत् ब्रह्म (ईश्वर) का कार्य है। साथ ही प्रातिभासिक, व्यावहारिक एवं पारमार्थिक इन तीन प्रकार की सत्ताओं में से यहाँ जगत् की व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक सत्ता को स्वीकार किया गया है, क्योंकि पदार्थ की वह सत्ता जो प्रतीतिकाल में सत्य प्रतीत हो, किन्तु कुछ समय के पश्चात् अन्य ज्ञान द्वारा बाधित हो जाए प्रातिभासिक कहलाती है। जैसे-रज्जु में सर्प की प्रतीति, क्योंकि प्रकाश की स्थिति में रज्जु में सर्पविषयकज्ञान का बाध होकर यथार्थसत्ता रज्जु का भान हो जाता है। उसीप्रकार इस दृश्यमान जगत् की प्रतीति ब्रह्मज्ञान पर्यन्त होती है। अतः यही इसकी प्रातिभासिक सत्ता हुई। इसके अतिरिक्त व्यवहार के समय दिखायी देने वाली पदार्थों की सत्ता को व्यावहारिकसत्ता कहा जाता है, क्योंकि यह सम्पूर्णजगत् तथा इसके घट, पट आदि पदार्थ व्यवहारकाल में सत्य हैं। अतः इसे व्यावहारिकसत्ता वाला भी माना जाएगा। पारममार्थिकसत्ता भौतिकपदार्थों की सत्ता से भिन्न एवं विलक्षण होती है, क्योंकि तीनों कालों में एकरूप में अवस्थित रहने वाली सत्ता पारमार्थिक कहलाती है तथा यह दृश्यमानजगत् एवं इसके घट-पट आदि पदार्थ विकारवान् हैं, नश्वर हैं, कल नहीं रहेंगे। अतः इसकी पारमार्थिकसत्ता का निषेध किया गया है। वेदान्त में एकमात्र ब्रह्म की पारमार्थिकसत्ता स्वीकार की गई है। इस आधार पर यह निष्कर्षरूप में कहा जा सकता है कि ब्रह्म पारमार्थिक दृष्टि से सत्य है तथा जगत् की सत्ता केवल व्यवहारकाल तक सीमित है। पारमार्थिकदृष्टि से जगत् मिथ्या है। दार्शनिकभाषा में दृश्यमान जगत् रस्सी में सर्प के समान केवल आभासित होता है। इसीकारण ब्रह्मज्ञान