वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ७५ हैं कि 'यह पर्वत अग्निवाला है।' यद्यपि उस अग्नि का हम प्रत्यक्ष नहीं कर रहे हैं, वह हमें दिखायी नहीं दे रही है, तथापि हमारे कथन में सत्यता है, वह प्रामाणिक है तथा इसे प्रमाणित करने वाला प्रमाण ही अनुमानप्रमाण है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि न्यायदर्शन के समान वेदान्त अन्वयव्यतिरेक व्याप्तियों को स्वीकार नहीं करता है। यहाँ केवल अन्वय- व्याप्ति ही आवश्यक है, क्योंकि इनके मत में व्यतिरेकव्याप्ति अभाव को सिद्ध करती है, भाव को नहीं। अतः यहाँ उसकी व्यर्थता स्वतःसिद्ध है। अभाव को सिद्ध करने के लिए वेदान्तदर्शन 'अनुपलब्धि' नामक प्रमाण को मान्यता प्रदान करता है, जिसका हम आगे उल्लेख करेंगे। इसलिए अनुमानप्रमाण में वेदान्तीलोग न्यायदर्शन के समान पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग न करके केवल तीन अवयवों में ही व्याप्ति एवं पक्षधर्मता की सिद्धि स्वीकार करते हैं जैसे- (क) यह पर्वत वह्नि वाला है (पर्वतोऽयं वह्निमान्) प्रतिज्ञावाक्य (ख) क्योंकि यह धूमवान् है (धूमवानोऽयम्) हेतुवाक्य (ग) जहाँ जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है, जैसाकि- रसोईघर (यत्र-यत्र धूमः तत्र तत्र वह्निः' यथा महानसः) उदाहरणवाक्य अतः यहाँ तीन अवयवों में ही पक्षधर्मता की सिद्धि हो जाती है। किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं साधन-धूम एवं साध्य-अग्नि का साहचर्य देखकर व्याप्ति ग्रहण करके दूर पर्वतप्रदेश में उठते हुए अग्नि के लिङ्ग (चिह्न) धूम को देखकर स्वयं ही वहाँ अग्नि की उपस्थिति का 'निश्चय' अनुमानप्रमाण द्वारा किया जाता है। अतः इसे स्वार्थानुमान की श्रेणी में रखा जाएगा। इसके विपरीत यदि यही ज्ञान अज्ञानीव्यक्ति को किसी ज्ञानी व्यक्ति द्वारा कराया जाता है तो इसी प्रक्रिया से गुजरने पर वह परार्थानुमान की कोटि में माना जाएगा। परार्थानुमान में व्यक्ति स्वयं अनुमान नहीं करता, अपितु किसी अन्य को उसका ज्ञान कराने के लिए त्रि-अवयवी वाक्यों का उसीप्रकार ग्रहण करता है। इसी आधार पर अनुमानप्रमाण के दो भेद कहे गये हैं-(1) स्वार्थानुमान एवं परार्थानुमान। इसमें परार्थानुमान का प्रयोग वेदान्ती प्रायः ब्रह्मभिन्न सम्पूर्णजगत् का मिथ्यात्व सिद्ध करने के लिए करते हैं। (iii) उपमान- सादृश्य के आधार पर प्रमा के कारणस्वरूप 'उपमान' को भी वेदान्तदर्शन स्वतन्त्रप्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान करता है। उनकी