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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 314 में से

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७६ वेदान्तसार उपमान विषयक यह परिकल्पना लगभग नैयायिकों के समान ही है। इस प्रक्रिया में हम पहले देखी गई किसी वस्तु की समानता के आधार पर अन्य वस्तु का प्रामाणिकज्ञान प्राप्त करते हैं। इसप्रकार इस प्रमाण का मुख्यहेतु अथवा आधार सादृश्य है, जो हमें यथार्थज्ञान (प्रमा) कराता है। वेदान्तदर्शन में भी न्यायदर्शन के समान ही इस प्रमाण को समझाने की दृष्टि से गो एवं गवय को उदाहरणरूप में लिया है। इस प्रमाण को उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझाया जा सकता है। किसी व्यक्ति का लड़का किसी दूसरे शहर में जाने की तैयारी कर रहा है। उसके मार्ग में एक जंगल पड़ता है। व्यक्ति अपने लड़के को समझाते हुए कहता है कि-बेटा! जंगल में 'गवय' से सावधान रहना। लड़का पूछता है-बापू! गवय कैसा होता है? इसपर व्यक्ति जवाब देता है कि तुमने गाय देखी है? बस वैसा ही गवय होता है, जो खतरनाक होता है। उससे बचकर रहना चाहिए। पिता की बात सुनकर वह लड़का जंगल से गुजरता है और वह गाय के समान दिखायी देने वाले एक जानवर को देखता है। उसे देखकर उसे अपने पिता द्वारा बतायी गई सभी बातें याद आती हैं और वह समझ जाता है कि यही गवय है। इस यथार्थज्ञान के होने पर वह उसकी दृष्टि में बिना पड़े सावधानीपूर्वक निकल जाता है। इसप्रकार 'गवय गाय के समान होता है', ऐसा ज्ञान प्राप्त किया हुआ, वह लड़का 'गवय' के दिखायी देने पर 'यह प्राणी ही गवय है', ऐसा निश्चय कर लेता है। अतः यथार्थज्ञान (प्रमा) कराने में यहाँ सादृश्य (उपमान) की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसीकारण इसे उपमानप्रमाण कहा गया है। (तत्र सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्) (iv) आगम-वेदान्तशास्त्र में आगम अर्थात् शब्दप्रमाण को भी मान्यता प्रदान की गई है। इतना ही नहीं यह दर्शन निर्गुण, निराकार एवं शाश्वत- सत्ता ब्रह्म का ज्ञान कराने में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आदि प्रमाणों की असमर्थता स्वीकार करते हुए एकमात्र आगमप्रमाण को ही सार्थक मानता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार-ब्रह्म का ज्ञान कराने में एकमात्र आगमप्रमाण ही समर्थ प्रमाण है। अन्य किसी प्रमाण से इसके अस्तित्व की सिद्धि असम्भव है। तदनुसार- वेद एवं श्रुतिवचनों को अपौरुषेय मानकर उन्हें शब्दप्रमाण के अन्तर्गत स्वीकार करना चाहिए।