वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ८१ वेदान्तदर्शन ब्रह्म को दृश्यमानजगत् का उपादान और निमित्त दोनों कारण मानता है। ठीक उसीप्रकार जैसे-मकड़ी स्वयं द्वारा बनाए गए जाले के लिए उपादान और निमित्त दोनों कारण होती है, क्योंकि जाले के निर्माण में काम आने वाला मुख्य आधाररूप तरलपदार्थ मकड़ी के शरीर से निकलता है। इस दृष्टि से मकड़ी जाल की उपादानकारण हुई तथा अपने पैरों द्वारा जाले की संरचना करने के कारण यही मकड़ी निमित्तकारण भी बनी। विद्वानों ने इसे सत्कार्यवाद का द्वितीयरूप विवर्तवाद नाम दिया, जिसकी स्थापना के लिए वेदान्तदर्शन मायावाद का आश्रय लेता है। इसका विस्तृत वर्णन हम सृष्टिप्रक्रिया में आगे करेंगे। उनके मत में-जब वस्तु अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही दूसरे रूप में प्रतीत होने लगती है, तो यह विवर्त कहलाता है तथा इस सिद्धान्त को विवर्तवाद कहते हैं। इसका उदाहरण रज्जु में सर्प की भ्रान्ति के रूप में दिया जाता है, क्योंकि उस स्थिति में रस्सी अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही सर्प के रूप में प्रतीत होने लगती है और यह प्रतीति वस्तुतः मिथ्या होती है। ब्रह्म में दिखायी देने वाली जगत् की प्रतीति को भी वेदान्त इसीप्रकार विवर्त के रूप में स्वीकार करता है। इसप्रकार निष्कर्षरूप में हम कह सकते हैं कि वेदान्त यद्यपि सत्कार्यवाद को स्वीकार करता है, क्योंकि यह सत्तत्त्वब्रह्म से मिथ्याजगत् की उत्पत्ति को मानता है, तथापि इसका सत्कार्यवाद सांख्य के सत्कार्यवाद से भिन्न है, क्योंकि सांख्य सत्कार्यवाद के परिणामवादी स्वरूप को मान्यता प्रदान करता है, जैसे दूध से दही का बनना। इस प्रसंग में यह ध्यातव्य है कि वेदान्तदर्शन ने दूध के परिवर्तितरूप दही को अयथार्थ माना है। उनके अनुसार हम इसे दही सम्बोधन तो करते हैं, किन्तु वास्तव में यह दूध ही है, मात्र अवस्था एवं कालभेद के कारण इसे नया नाम दिया गया है। कुछ विद्वानों ने सांख्य के परिणामवाद को विवर्तवाद का पूर्वभूमि भी माना है। उनके मत में जिसप्रकार दूसरी मञ्जिल पर पहुँचने के लिए पूर्व मञ्जिल को पार करना पड़ता है। उसीप्रकार विवर्तवाद तक पहुँचने के लिए परिणामवाद की मञ्जिल तय करनी पड़ती है- विवर्तभावस्य हि पूर्वभूमिः वेदान्तवादे परिणामवादः। व्यवस्थितेऽस्मिन् परिणामवादे स्वयं समायाति विवर्तवादः॥ (सर्वज्ञात्ममुनि-संक्षेपशारीरक-2/69)