वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ वेदान्तसार (१६) समष्टि-व्यष्टि सिद्धान्त-वेदान्तदर्शन एवं इसकी सृष्टि-प्रक्रिया को भलीभाँति समझने के लिए इसमें प्रतिपादित समष्टि-व्यष्टि के सिद्धान्त को समझना आवश्यक है। जिसका हम यहाँ संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। इस दर्शन के अनुसार-एक का कथन करने की विवक्षा में व्यष्टि तथा समूह का कथन करने की विवक्षा होने पर समष्टि अभिप्राय होता है। इसे उदाहरण द्वारा हम इसप्रकार समझ सकते हैं। जब हम किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कुछ कहते हैं तो यह व्यष्टि कहलाएगा, किन्तु जब हम लोगों के समूह को इंगित करते हैं तो यह समष्टि माना जाएगा। वेदान्तदर्शन में इन दोनों शब्दों का अनेकशः प्रयोग किया गया है। आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में इन शब्दों की इसप्रकार व्याख्या की है- "यथा वृक्षाणां समष्ट्यभिप्रायेण वनमित्येकत्वव्यपदेशो यथा जलानां समष्ट्यभिप्रायेण जलाशय इति तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानां जीवगताज्ञानानां समष्ट्यभिप्रायेण तदेकत्व व्यपदेशः।।" अर्थात् जिसप्रकार वृक्षों को समुदाय की दृष्टि से 'वन' कहकर एक संख्यासूचक शब्द का व्यवहार करते हैं अथवा जिसप्रकार जल के कणों के समूह की विवक्षा में 'जलाशय' ऐसा कहते हैं। ठीक उसीप्रकार अनेक संख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञान के समूह को समष्टि कहा जाता है। यह वस्तुतः इस सबमें ऐक्य का सूचक है। अन्तर केवल इतना है कि व्यष्टि की अपेक्षा यहाँ समष्टि को उत्कृष्ट अथवा उन्नत उपाधि वाली कहा है, क्योंकि समष्टि रागादिदोष से शून्य शुद्धसत्त्वप्रधान होती है (इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना)। इसीलिए यहाँ व्यष्टिगत अज्ञान की अपेक्षा समष्टिगत अज्ञान को उत्कृष्ट बताया गया है, क्योंकि इसमें विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता रहती है। वस्तुतः यहाँ अज्ञान में स्थित सत्त्वगुण, रजस् एवं तमस् को अभिभूत किए रहता है, स्वयं पराभूत नहीं होता है। उत्कृष्ट उपाधि से युक्त चैतन्य को इसीकारण सर्वज्ञाता, सबका ईश्वर सर्वनियन्ता, अव्यक्त, अन्तर्यामी तथा संसार का कारणरूप कहा गया है। सबका मूलभूतकारण होने से ईश्वर की यह समष्टि कारणशरीर, आनन्द की प्रचुरता होने के कारण आनन्दमयकोष तथा स्थूल एवं सूक्ष्मजगत् प्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण सुषुप्ति कहलाती है।