भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 145 में से

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( ११२ ) वेदान्तसार । वस्तुकी चिन्तना का नाम मननहै। तत्त्वज्ञानके विरोधी दे- हादि जड पदार्थ ज्ञानको त्याग कर अद्वितीय ब्रह्म वस्तुके अनुकूल ज्ञानके प्रवाह ( आधिक्य ) को निदिध्यासन कह- तेहैं। समाधि दो प्रकार का है। एक सविकल्पक,दूसरा निर्वि- कल्पक । ज्ञाता ज्ञान और जानने योग्य वस्तु इन तीन पदार्थोंको पृथक् पृथक् ज्ञान होनेपरभी अद्वितीय ब्रह्म वस्तुमें अखंडाकार चित्तकी वृत्ति होना सविकल्पक समाधि कहाताहै । जैसे मृत्तिकाके हस्तीसे हस्तीका ज्ञान होनेपर भी मृत्तिकाही है ऐसा ज्ञान होताहै तिस प्रकार द्वैतज्ञान होने परभी अद्वैत ज्ञान होताहै । इस विषयमें प्रमाण भी कहाहै-“ सर्वसाक्षी, सर्वव्यापी, सर्वोत्कृष्ट, स्वप्रकाशस्वरूप, जन्ममृत्युरहित, निर्लिप्त, और सर्वदा मुक्तस्वभाव जो अद्वितीय ब्रह्म है सो मैं हूं ” ॥ ९१ ॥ निर्विकल्पकस्तु ज्ञातृज्ञानादिभेदलयापेक्षया द्वि- तीयवस्तुनि तदाकाराकारिताया बुद्धिवृत्तेरतित- रामेकीभावेनावस्थानम् । तदा तु जलाकाराका- रितलवणानवभासेन जलमात्रावभासवत् द्वितीय- वस्त्वाकाराकारितचित्तवृत्त्यनवभासेनाद्वितीयव- स्तुमात्रमेवावभासते। ततश्चास्य सुषुप्तेश्चाभेदश- ङ्का न भवति । उभयत्र वृत्त्यभाने समानेऽपि त- त्सद्भावासद्भावमात्रेणानयोर्भेदोपपत्तेः ॥ ९२ ॥ ( सं०टी० ) समाधिस्वरूपमाह । निर्विकल्पकस्त्व-

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