वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) वेदान्तसार । कहते हैं। आनन्दके आधिक्य होनेसे और कोषकी तरह आच्छादक होनेसे आनन्दमय कोषभी कहते हैं। यह शरी- रही सम्पूर्ण इन्द्रियोंके उपरामका स्थान होनेसे सुषुप्ति कहा- ताहै इसी कारण इसको स्थूल और सूक्ष्म प्रपञ्चका लय- स्थान कहते हैं । जिस तरह बनके वृक्ष सबको अलग अलग- ग्रहण करनेसे उसको अनेक वृक्षोंद्वारा व्यवहार किया जा- ताहै इसी प्रकार जलाशयके जल व्यष्टिभावसे अनेक जल प्र- तीत होयहैं इसी प्रकार नानाप्रकारके विराजमान जीवसमूहके अज्ञानको व्यष्टिरूपसे अनेक व्यवहार करें हैं। श्रुतिने भी क- हाहै-“ईश्वर नानाप्रकारकी मायाओंके द्वारा नानारूप धारण करताहै।” इस स्थलमें ईश्वरको प्रत्येक जीव व्यापी होनेसे व्यष्टि और समस्त जीवव्यापी होनेसे समष्टिरूप जनना॥ २७॥ इयं व्यष्टिर्निकृष्टोपाधितया मलिनसत्वप्रधाना एत- दुपहितचैतन्यमल्पज्ञत्वानीश्वरत्वादिगुणं प्राज्ञ- इत्युच्यते एकाज्ञानावभासकत्वादस्य प्राज्ञत्वं अ- स्पष्टोपाधितयाऽनतिप्रकाशकत्वम् ॥ २८ ॥ (सं०टी०) तत्र महाप्रलयकालीनसमष्ट्युपाधिभूतविशुद्ध सत्वप्रधानाया मूलप्रकृतेः सकाशात् दैनंदिनप्रलयकालीन- व्यष्ट्युपाधिभूतजीवप्रकृतेर्भेदं दर्शयति । इयं व्यष्टिरिति । इ- यं जीवगताज्ञानसुषुप्त्यवस्थापन्नाहंकारादिविक्षेपसंस्कारादिरू- पा निकृष्टोपाधित्वेन मलिनसत्वप्रधानेत्यर्थः। अनेनोपाधिनाप्रा- ज्ञचैतन्यं लक्षयति। एतदुपहितमिति । अत्रोपपत्तिमाह एके-