भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ३५) ल्पस्थानमें रहनेवाला मेघमण्डल सहस्रों योजन विस्तीर्ण सू- र्य्यका आच्छादक कहाजाताहै तिसीप्रकार अविवेकी म- नुष्यके ज्ञानका आवरण करनेवाला तथा सर्वव्यापी परब्रह्म- का आच्छादक रूप प्रसिद्ध अज्ञानकी शक्तिको आवरणशक्ति कहतेहैं । हस्तामलकमें लिखाभी है-“जैसे अज्ञानी पुरुषके नेत्र मेघसे आच्छादित होजातेहैं तब कहैंहैं कि सूर्य्यम- ण्डलको मेघमण्डलने आच्छादित करदिया । तिसी प्रकार मूढ दृष्टि पुरुष जिसको बद्ध कहते हैं मैं वही नित्यज्ञान स्वरूप आत्मा हूँ” ॥ ३५ ॥ अनयावृतस्यात्मनः कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखित्वदुःखि- त्वादिसंसारसम्भावनापिभवति यथा स्वज्ञानेनावृ- तायां रज्ज्वां सर्पत्वसम्भावना ॥ ३६ ॥ (सं०टी०) अनयैवावरणशक्त्यावच्छिन्नस्यात्मनःकर्तृ- त्वभोक्तृत्वसुखदुःखमोहात्मकत्वतुच्छसंसारसंभावनापि सं- भाव्यत इत्याह । अनयेति । इयमेवावरणशक्तिरात्मनो भेदबु- द्धिजनकत्वेन संसारहेतुरिति भावः । अत्रानुरूपं दृष्टांतमाह । यथा स्वाज्ञानेनेति ॥ ३६ ॥ (भा०टी०) जैसे भ्रमवशसे रज्जुमें रज्जुका ज्ञान नहीं होय है सर्पज्ञान उत्पन्न होजाय है तिसी प्रकार अज्ञानकी आवरण शक्तिद्वारा आच्छादित आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होय है और मैं कर्त्ता हूं भोक्ता हूं सुखी हूं दुःखी हूं इत्यादि मोहजालसे व्याप्त संसारका बोध होता है ॥ ३६ ॥