वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ५१ ) ( सं०टी० ) व्यष्टिरूपं विज्ञानमयादिकोशत्रयं तैजसस्या- पि सूक्ष्मं शरीरमिति दर्शयति । अस्यापीति । सूक्ष्मशरीर- त्वे हेतुमाह । स्थूलेति । अस्यापि स्वप्नत्वेहेतुमाह । जाग्रदि- ति। विश्वचैतन्येनानुभूतस्थूलशरीरविषयवासनामयत्वात्स्वप्न- मित्यर्थः।अस्यैव सूक्ष्मशरीरस्य स्थलशरीरलयस्थानत्वे युक्ति- माह । अत एवेति । यथा पूर्वं प्राज्ञेश्वरावज्ञानवृत्तिभिः सुषु- प्त्यवस्थायामानंदमनुभवतः तथा हिरण्यगर्भतैजसावपि स्व- भावस्थायां मनोवृत्तिभिर्वासनामयान् शब्दादिविषयाननुभ- वत इति दर्शयति । एताविति । अस्मिन्नर्थे श्रुतिमुदाहरति । प्रवि- विक्तेति । प्रविविक्तं भुंक्त इति प्रविविक्तभुक् तैजसः तेजोंतः- करणं कार्यादिभावेन परिणतं तदेव स्थूलशरीरादिहीनं यस्य स तैजसः तेजोंतःकरणस्वामीत्यर्थः ॥ ५० ॥ ( भा०टी० ) पूर्वोक्त तैजसके उपाधिस्वरूप इसी व्यष्टि- भूत सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीरकी अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म है । इसी कारण उसको सूक्ष्मशरीर और कोशत्रय कहते हैं। यह सूक्ष्म शरीर वासनामय है इसको स्वप्न और स्थूलशरीरका लयस्थान कहते हैं। सुषुप्ति अवस्थामें यही हिरण्यगर्भ और तैजस दोनों सूक्ष्म, मनकी वृत्तिद्वारा सूक्ष्म विषयका अनुभव करते हैं। इस विषयमें श्रुतिका प्रमाण है कि “तैजसही सूक्ष्म वस्तुका उपभोग करता है” ॥ ५० ॥ अत्रापिसमष्टिव्यष्ट्योस्तदुपहितसूत्रात्मतैजसयो- श्च वनवृक्षवत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलव-