भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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( ५६ ) वेदान्तसार । ( सं०टी० ) उक्तेभ्यो भूतेभ्यः चतुर्दशभुवनोत्पत्तिप्रकारं दर्शयति । एतेभ्य इति । एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्पन्नब्रह्मां- डस्य चतुर्विधशरीराणां च तद्योग्यान्नपानादीनां चोत्पत्तिर्भ- वतीत्यर्थः ॥ ५५ ॥ ( भा०टी० ) इन्हीं सम्पूर्ण पञ्चीकृत आकाशादि भूतोंसे ऊपर ऊपर विद्यमान भूर्लोक भुवर्लोक स्वर्लोक महर्लोक ज- नलोक तपलोक और सत्यलोक उत्पन्न होते हैं. इन्हींसे क्रमसे नीचे नीचे होनेवाले अतल वितल सुतल रसातल तलातल महातल और पाताल ये सम्पूर्ण लोक उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार इनपञ्चभूतोंसेही ब्रह्माण्ड और चार प्रकारकेस्थूलशरीर और शरीरोंके भोज्य अन्नपानादि उत्पन्न होतेहैं ॥ ५५ ॥ चतुर्विधस्थूलशरीराणि जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भि- ज्जाख्यानि ॥ जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि म- नुष्यपश्वादीनि । अण्डजानि अण्डेभ्यो जातानि पक्षिपन्नगादीनि । स्वेदजानि स्वेदेभ्यो जातानि यू- कमशकादीनि । उद्भिज्जानि भूमिमुद्भिद्य जातानि लतावृक्षादीनि ॥ ५६ ॥ ( सं०टी० ) चतुर्विधशरीराण्युद्दिशति । चतुर्विधेति । तानि च यथोद्देशं विवृणोति । जरायुभ्य इति ॥ ५६ ॥ ( भा० टी० ) स्थूलशरीरके चार भेद हैं । जरायुज, अ- ण्डज, स्वेदज, व उद्भिज्ज । जरायुसे उत्पन्न होनेवाले मनुष्य पशु आदिको जरायुज कहते हैं । अण्डसे उत्पन्न होनेवाले