भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 145 में से

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( ७२ ) वेदान्तसार । बलाद्वरवध्वोररुंधतीदर्शने प्राप्ते परमसूक्ष्मरूपाया अरुंधत्याः प्रथमकक्षायामेव प्रतिपत्तुमशक्यत्वात्प्रथमं चंद्रज्योतीरूपारुं- धतीत्युच्यते ततः चंद्रभिन्ना तारकारुंधतीत्युच्यते तत इतर- तारकाभिन्ना सप्ततारकात्मकारुंधतीत्युच्यते तदनंतरमितरता- रकाचतुष्टयभिन्ना तारकात्रितयात्मकेत्युच्यते ततः तन्मध्ये तारकेत्युच्यते ततस्तत्समीपवर्तिनी परमसूक्ष्मारुंधतीत्युच्यते न चैतावतैतेषां पंचानां वाक्यानां परस्परविरुद्धार्थप्रतिपादक- त्वेनाप्रामाण्यं शक्यं प्रतिपादयितुम्। किंतु प्रतिपत्तृबुद्ध्यनुसारेण सोपानक्रमवत्पूर्वपूर्वनिराकरणद्वारा सूक्ष्मारुंधतीप्रतिपादने ता- त्पर्यं तद्वदत्रापि अन्नमयः प्राणमयो मनोमयो विज्ञानमय आनं- दमय आत्मा ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छब्रह्मपर्यवसितानां पंच- कोशवाक्यानामपि परस्परविरुद्धार्थप्रतिपत्तृबुद्ध्यनुसारेण सो- पानक्रमवत्पूर्वपूर्वनिराकरणद्वारा परमसूक्ष्मपुच्छब्रह्मप्रतिपाद- ने तात्पर्यं तस्मात्सर्वेषां वेदवाक्यानां साक्षात्परंपरया वाऽद्विती- यवस्तुप्रतिपादने तात्पर्यात्प्रामाण्यरूपविरोध इति संक्षेपः ७०॥ ( भा०टी० ) यदि पुत्रादिको आत्मा कहेंगे तब श्रुति आदि प्रमाणोंको अत्यन्त विरोध पड़ेगा क्योंकि-“आत्मा स्थूल नहीं है, आत्मा इन्द्रियगण नहीं है, प्राण नहीं है, मन नहीं है, और कर्त्ता नहीं है, परन्तु केवल चैतन्यमय सत्य स्व- रूप है”। इत्यादि प्रबल श्रुतिद्वारा प्रमाण होता है। पुत्रादिसे शून्यपर्य्यन्त जड़के चैतन्यके भासक हेतु घटादिकी तरह अनित्य है अर्थात् हेत्वाभास है और ज्ञानियोंको मैंही ब्रह्म हूं