भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 145 में से

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पृष्ठ 78

( ७८ ) वेदान्तसार । प्रकारके पदार्थ दग्ध(तपेहुए)लोहकी तरह अतिरिक्तरूप“तत्” इस पदके वाच्य होते हैं और अज्ञानादिकी समष्टिरूप उपाधि और तदुपहित ईश्वरादि चैतन्यका आधारभूत तुरीयब्रह्मचै- तन्य “तत्” पदका लक्ष्यार्थ होता है ॥ ७३ ॥ अज्ञानादिव्यष्टिः तदुपहितालपज्ञत्वादिविशिष्ट- चैतन्यं एतदनुपहितं चैतन्यञ्चैतत्त्रयं तप्तायःपि- ण्डवदेकत्वेन भासमानं त्वंपदवाच्यो भवति। एत- दुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं प्रत्यगानन्दं तुरी- यं चैतन्यं त्वंपदलक्ष्यार्थो भवति ॥ ७४ ॥ ( सं० टी० ) त्वंपदवाच्यार्थमाह। अज्ञानादीति। व्यष्टि- भूतपदज्ञानमंतःकरणं तदवच्छिन्नं जीवचैतन्यं तदनुपहितं चै तन्यं चैतत्त्रयं तप्तायःपिंडवत्परस्परतादात्म्याध्यासेनाभेदवि- वक्षया त्वंपदवाच्यार्थो भवतीत्यर्थः। लक्ष्यार्थमाह। एतदुपा- धीति। अंतःकरणोपहितचैतन्यस्याधारभूतंयदनुपहितं प्रत्यगा- त्मानंदं तुरीयं चैतन्यं त्वंपदलक्ष्यार्थो भवतीत्यर्थः ॥ ७४ ॥ ( भा० टी० ) अज्ञानादिकी व्यष्टि अर्थात् अज्ञान, सू- क्ष्मशरीर और स्थूलशरीर तदुपहितचैतन्य अर्थात् प्राज्ञ तैजस और विश्व तथा अनुपहित चैतन्य अर्थात् तुरीय ब्रह्म चैतन्य, ये तीनों तपेहुए लोहपिण्डकी तरह अभिन्नरूप “त्वम्” पदके वाच्य होते हैं तथा अज्ञानादिकी व्यष्टि और प्राज्ञ आदि चैतन्यका आधारस्वरूप अनुपहित आनन्दरूप तु- रीयब्रह्मचैतन्य “त्वम्” इस पदका लक्ष्यार्थ होता है ॥ ७४ ॥