वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ें·संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ७९ ) अथ महावाक्यार्थो वर्ण्यते । इदं तत्त्वमसि वाक्यं सम्बन्धत्रयेण अखण्डार्थबोधकं भवति । सम्बन्ध- त्रयं नाम पदयोः सामानाधिकरण्यं पदार्थयोर्वि- शेषणविशेष्यभावः प्रत्यगात्मपदार्थयोर्लक्ष्यलक्ष- णभावश्चेति । यदुक्तम्-“सामानाधिकरण्यं च वि- शेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्य- गात्मनाम्”इति ॥ ७५ ॥ ( सं०टी० ) पदार्थमभिधाय वाक्यार्थमाह। अथेति। ननु जीवेश्वरयोः किंचिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्वादिविशिष्टयोरत्यंतविलक्षण- योः तत्त्वमस्यादिमहावाक्यानि परस्परविरुद्धार्थप्रतिपादकानि कथमखंडैकरसं ब्रह्म प्रतिपादयंतीत्याशंक्य साक्षादैक्यप्रतिपा- दकत्वाभावेपि लक्षणया संबंधत्रयेणाखंडैकार्थ प्रतिपादयंती- त्याह । इदमिति । संबंधत्रयस्वरूपमाह । संबंधत्रयमिति । पद- पदार्थप्रत्यगात्मनांसंबंधत्रयसद्भावे वृद्धसंमतिमाह। यदुक्तमिति। ( भा०टी० ) अब महावाक्यके अर्थका विचार कर- ते हैं—“तत्त्वमसि” यह वाक्य तीन प्रकारके सम्बन्धोंके द्वा- रा अखंड ब्रह्म चैतन्यका बोधक होता है सम्बन्ध त्रय कहाते हैं—पहला सामानाधिकरण्य,दूसरा विशेष्यविशेषणभाव, ती- सरा लक्ष्यलक्षणभाव, “तत्” और “त्वम्” इनदोनों पदों- की एक अधिकरणमें अवस्थिति होनेपर सामानाधिकरण्य सम्बन्ध होता है दोनों पदोंका परस्पर विशेष्यविशेषण रूप सम्बन्धको विशेष्यविशेषणभाव कहतेहैं । और प्रत्यगा-