भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 145 में से

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ८३ ) धक होताहै और “अयम्” पद का अर्थ वर्त्तमान काल में दृ- ष्टिगोचर वस्तुका बोधक होता है और इन दोनोंपदोंके अ- र्थोंका परस्पर विशेष्यविशेषणरूप सम्बन्ध है क्योंकि ए- कही व्यक्तिमें दोनों पदोंके अर्थोंका तात्पर्य्य अभिन्नरूपसे मालूम होता है । तिसी प्रकार “तत्त्वमसि” इस वाक्यमें भी “तत्” पदका अर्थ अप्रत्यक्ष चैतन्य और “त्वम्” पदका अ- र्थ प्रत्यक्ष चैतन्य है इन दोनों पदोंके अर्थोंका परस्पर वि- शेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध है क्योंकि दोनों पदोंके अर्थों का एक वस्तु में अभिन्न रूप से तात्पर्य्य मालूम होता है ॥ ७७ ॥ लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्धस्तु यथा तत्रैव सशब्दायं- शब्दयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धतत्कालैतत्कालविशिष्ट- त्वपरित्यागेन अविरुद्धदेवदत्तेन सह लक्ष्यलक्षण- भावः । तथात्रापि वाक्ये तत्त्वंपदयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धपरोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्टत्वपरित्यागेन विरुद्धचैतन्येन सह लक्ष्यलक्षणभावः । इयमेव भागलक्षणेत्युच्यते ॥ ७८ ॥ ( सं०टी० ) क्रमप्राप्तं लक्ष्यलक्षणभावसंबंधस्वरूपं निरू- पयितुमाह । लक्ष्यलक्षणेति । असाधारणधर्मप्रतिपादकं वा- क्यं लक्षणवाक्यं तत्प्रतिपाद्यमवशिष्टं वस्तु लक्ष्यं तथाच सोयं देवदत्त इत्यस्मिन्नेव वाक्ये सोऽयंशब्दयोः तदर्थयोर्वा वि- रुद्धतत्कालतद्देशएतत्कालैतद्देशविशिष्टत्वपरिहारेणाविरुद्धदे- वदत्तपिंडेन सह लक्ष्यलक्षणभावसंबंध इत्यर्थः । उक्तमर्थं दा-