भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 145 में से

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पृष्ठ 88

( ८८ ) वेदान्तसार । रित्यज्येत्यर्थः । तत्त्वमसीति वाक्ये प्राक्प्रतिज्ञातं जहल्लक्षणा- संभवमाविष्करोति । अत्र त्विति । तु शब्दः पूर्वस्माद्वैषम्यं द्योतयति। तत्त्वमसीति वाक्ये परोक्षत्वापरोक्षत्वविशिष्टचैतन्यै कत्वलक्षणस्य वाक्यार्थस्य विरोधाभावात्परोक्षत्वापरोक्षत्व- प्रतिपादकत्वांशे विरोधाच्चैतन्यैकत्वे विरोधाभावाद्गंगाघो- षादिवाक्यवत्सर्वात्मना मुख्यार्थपरित्यागासंभवाज्जहल्लक्षणा न संभवतीत्यर्थः । तत्र हेतुमाह । भागांतरमिति । विरुद्ध- योः परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरेकत्वासंभवेन तत्परित्यागेपि चैत- न्यभागस्यैकत्वे विरोधाभावात् त्यागो न युज्यत इत्यर्थः ८० ( भा०टी० ) जैसे " गङ्गायां घोषः प्रतिवसति " इस वाक्यमें जहत्स्वार्थलक्षणा वृत्तिसे वक्यार्थ सङ्गत होता है। तिस प्रकार " तत्त्वमसि " इस वाक्यका जहत्स्वार्थल- क्षणा द्वारा वाक्यार्थ सङ्गत नहीं होता है क्योंकि "गङ्गायां घोषः प्रतिवसति " इस वाक्यमें भगीरथरथखातावच्छिन्न जलप्रवाहरूप गङ्ग और घोष ( आभीरपल्ली ) इनका आ- धाराधेयभाव असम्भव होनेसे वाक्यार्थ बाधित होता है। इस कारण विरोध दूर करनेके अर्थ तात्पर्यकी अनुपपत्ति होनेसे गङ्गा पदका शक्यार्थ जो भगीरथरथखातावच्छिन्न जल प्रवाह उसका परित्याग करके लक्षणाद्वारा गङ्गाके समीप वर्ति गङ्गातीरमें गङ्गापदका अर्थ युक्तिद्वारा कल्पना किया जाताहै। इस प्रकार शब्दका मुख्य अर्थ परित्याग करके अन्य अर्थका स्वीकार करना । लक्षणा अर्थात् जहत्स्वार्थलक्षणा