भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 145 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ९ ) च्छं स्वान्तमन्तःकरणं यस्य स तथोक्तः वक्ष्यमाणसाधनचतु- ष्टयसंपन्नःप्रमाता अंतःकरणेप्रतिबिंबितं चैतन्यमित्यर्थः ॥ ६ ॥ ( भा०टी० )(स्वाध्यायोऽध्येतव्यः-सर्वदा स्वाध्यायाच- रण करना चाहिये ) इस प्रकार वेदोक्त विधिवाक्योंके अ- नुसार जिसको वेद ( ऋक्, यजुः, साम, अथर्व, ) वेदाङ्ग ( शि- क्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, ) अध्ययन करके सामान्यतः सकल वेदार्थ प्राप्त होगया है । तथा जिस- का इस जन्ममें तथा जन्मान्तरमें काम्य और निषिद्ध कर्म्म परित्याग करके नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासना इ- त्यादि कायोंके अनुष्ठान करनेसे सम्पूर्ण पापोंका नाश होने- से अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल होगयाहै । तथा जो पुरुष साधनचतुष्टयसम्पन्न है वह पुरुष ईश्वरतत्त्वके विचार करनेमें अर्थात् वेदान्तशास्त्रमें अधिकरी होता है ॥ ६ ॥ काम्यानि स्वर्गादीष्टसाधनानि ज्योतिष्टोमादीनि ॥ निषिद्धानिनरकायनिष्टसाधनानिब्रह्महननादीनि॥ नित्यानि अकरणे प्रत्यवायसाधनानि सन्ध्यावन्द- नादीनि॥नैमित्तिकानिपुत्रजन्माद्यनुबन्धीनिजाते- ष्ट्यादीनि ॥ प्रायश्चित्तानि पापक्षयमात्रसाधना- नि चान्द्रायणादीनि । उपासनानि सगुणब्रह्मविषय कमानसव्यापाररूपाणि शाण्डिल्यविद्यादीनि ॥ एतेषां नित्यादीनां बुद्धिशुद्धिः परं प्रयोजनम् । उपासानानान्तुचित्तैकाग्र्यम् ॥ “तमेतमात्मानं