वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ९८ ) वेदान्तसार । अखण्ड चैतन्यका बोध होजायहै उस समय मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वरूप, परमानन्द, अद्वितीय, ब्रह्म हूँ इस प्रकार अखण्ड अन्तःकरण वृत्ति होती है वह अन्तःकरण वृत्ति चैतन्यप्रतिबिंबित होती है तब वह चित्तवृत्ति चैतन्य द्वारा प्रकाशित होकर प्रत्यगात्मा (जीव ब्रह्मका अभेद ज्ञान) और अभिन्न परब्रह्म विषयक अज्ञानका नाश करदेतीहै। जैसे वस्त्रके तन्तुका नाश होनेसे वस्त्र नष्ट हो जाताहै तिसी सम्पूर्ण संसारके कारण अज्ञानका नाश होनेसे तदन्तर्गत अखण्डा- कार अन्तःकरणकी वृत्तिभी नष्ट हो जातीहै ॥ ८५ ॥ तत्र वृत्तौ प्रतिबिम्बितं चैतन्यमपि यथा प्रदीप- प्रभा आदित्यप्रभावभासनसमर्था सती तयाभिभू- ताभवतितथास्वयंप्रकाशमानप्रत्यगभिन्नपरब्रह्मा- वभासनानर्हतया तेनाभिभूतं सत्स्वोपाधिभूता- खण्डवृत्तेर्बाधितत्वादर्पणाभावे मुखप्रतिबिम्बस्य मुखत्वमात्रवत्प्रत्यगभिन्नपरब्रह्ममात्रं भवति॥८६॥ ( सं०टी० ) ननु तथाप्यखंडाकारवृत्तिप्रतिबिंबितचैत- न्याभासस्य सत्त्वात्कथमद्वैतसिद्धिरित्याशंक्याह । तत्रेति । वृत्तिनिवृत्तौतत्प्रतिबिंबितचैतन्यस्य बिंबावभासनासमर्थत्वा- द्वृत्त्युपाधिबाधेन तत्प्रतिबिंबचैतन्यमपि चैतन्यमात्रतयावशि- ष्यते दर्पणोपाधिविगमे तत्प्रतिबिंबितमुखाभासस्य बिंबीभू- तमुखमात्रतावशेषवदित्यर्थः । अयंभावः । शोधिततत्त्वंपदा- र्थस्याधिकारिणः तद्विजृंभितगुरुशास्त्रादिभ्यः तत्त्वमसीत्युप-