वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ वेणीसंहारं नाटकं अश्वत्थामा—कथमियममानुषी वाङ्नानुमनुते सङ्ग्रामावतरणं मम। सर्वथा पाण्डवपक्षपातिनो देवाः। भोः कष्ट कष्टम्। दुःशासनस्य रुधिरे पीयमानेऽप्युदासितम्। दुर्योधनस्य कर्ताऽस्मि किमन्यत्प्रियमाहवे ॥ ४९ ॥ मातुल, राधेयक्रोधवशादनार्यमस्माभिराचरितम्। अतस्त्वमपि ताव- दस्य राज्ञः पार्श्ववर्ती भव। कृपः गच्छाम्यहमत्र प्रतिविधातुम्। भवानपि शिविरसन्निवेशमेव प्रतिष्ठताम्। (परिक्रम्य निष्क्रान्तौ।) इति तृतीयोऽङ्कः। अन्वयः— दुःशासनस्य, रुधिरे, पीयमाने, अपि, उदासितम् ( मया ) ( तदा ) आहवे, दुर्योधनस्य, प्रियम्, अन्यत्, किम्, कर्त्ता, अस्मि ॥ ४९ ॥ साम्प्रतमुदस्ततोऽग्रे कि कारिष्यामीत्याह = दुःशासनस्येति । पीयमाने, भीमनेति शेषः । उदासितम् मयेति शेषः । आहवे = सङ्ग्रामे, प्रियम् = इष्टम्, कर्ता-तृन्प्रत्य- यान्तमिदम् अतो 'न लोकाव्ययं'ति निषेधान्न कृद्योगे षष्ठी अस्मि, न किमपीत्यर्थः । यदि साम्प्रतं भीमाद् दुःशासनस्य रक्षा न कृता तदाऽग्रे दुर्योधनस्य क उपकारो विधास्यते मयेति भावः । अनुष्टुप् छन्दः ॥ ४९ ॥ अनार्य = शस्त्रपरित्यागरूपम् । इति प्रबोधिनी-व्याख्यायां तृतीयोऽङ्कः । अश्वत्थामा—क्यों दैवी वाणी को यह मेरा युद्धक्षेत्र में उतरना अभीष्ट नहीं है ? कष्ट की बात है ! हाय देवता लोग भी पाण्डवों के ही समर्थक हैं। अब भीम के द्वारा दुःशासन का रक्तपान किया गया ही समझना चाहिए। हाय ! दुःख !! दुःख !!! दुःशासन का रक्तपान होते हुए भी तटस्थ हूं, तब संग्राम की आपत्तिकाल में इससे बढकर प्रिय और दूसरा कार्य दुर्योधन का कौनसा है जिसे मैं सम्पादन करूँ ॥ ४९ ॥ मामा ! कर्ण के प्रति किये गये क्रोध के आवेश में पड़कर मैंने अच्छा नहीं किया, अच्छा, अब आप भी इस राजा की रक्षा के लिये तैयार रहिये। कृप—अच्छा मैं सहायतार्थ जा रहा हूँ तुम शिविर के लिए प्रस्थान कर दो । (दोनों घूमकर चले जाते हैं) ॥ तीसरा अङ्क समाप्त ॥