भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

१५८ | वेणीसंहार नाटकं वेश्मैव प्रविष्टः । कष्टं भोः, कष्टम् । दत्त्वा द्रोणेन पार्थादभयमपि न संरक्षितः सिन्धुराजः क्रूरं दुःशासनेऽस्मिन्हरिण इव कृतं भीमसेनेन कर्म । दुःसाध्यामप्यरीणां लघुमिव समरे पूरयित्वा प्रतिज्ञां नाहं मन्ये सकामं कुरुकुलविमुखं दैवमेतावतापि ॥ २ ॥ ( राजानमवलोक्य । ) कथमद्यापि चेतनतां न लभते महाराजः ? भोः, अन्वयः- द्रोणेन, पार्थात्, अभयम् दत्त्वा, अपि, सिन्धुराजः, न संरक्षितः, भीमसेनेन, अरीणाम्, दुःसाध्याम्, अपि, लघुमिव, प्रतिज्ञाम्, समरे, पूरयित्वा, अस्मिन्, दुःशासने, हरिणे, इव, क्रूरम्, कर्म, कृतम्, एतावता, अपि, अहम्, कुरुकुल- विमुखम्, दैवम्, सकामम्, न मन्ये ॥ २ ॥ सिन्धुराजादीनां वधेऽपि कुरुकुलविपरीतभाग्यस्य सन्तोषो न जातोऽत एव दुर्योधनश्चैतन्यं न लभत इत्याह - दत्त्वेति । पार्थात् अभयं = भयाभावम, दत्त्वा, अपि, सिन्धुराजः, न संरक्षितः, भीमसेनेन, अरीणां = शत्रूणांः, दुःसाध्यां = दुःखेन सम्पादनीयाम्, 'कृत्यानामि'ति कर्तरि षष्ठी । प्रतिज्ञां = शोणितपानरूपाम्, पूरयित्वा = निष्पाद्य, हरिणे = मृगे, इव क्रूरं = निर्दयम्, कर्म, कृतम् एतावता = एकोनशतधृतराष्ट्रपुत्रादिवधेन, अपि अहं = सूतः, दैवं = भाग्यम् सकामं = पूर्णमनोर- थम्, न मन्ये = स्वीकरोमि । अतः परमपि किमपि भावीत्यर्थः । अत्रोपमालङ्कारः । स्रग्धरा छन्दः ॥ २ ॥ चेतनतां = चैतन्यम्, विगतमूर्च्छत्वमित्यर्थः । के भीतर प्रवेश कर गए हैं । बड़े कष्ट की बात है । द्रोणाचार्य ने अर्जुन से जयद्रथ की रक्षा के लिये अभयदान दिया था तथापि रक्षा नहीं किया । भीमसेन ने हरिण के सदृश दुश्शासन का वधरूप नीच कर्म किया । जिस प्रतिज्ञा की पूर्ति शत्रुओं के लिये असंभव बात थी उसकी बड़ी सरलता से पूर्ति कराके-मेरा जहाँ तक विचार है-कुरुवंश के विपरीत विधाता इतने पर भी सन्तुष्ट नहीं है अर्थात द्रोणाचार्य जैसे वीर जयद्रथ की रक्षा का भार लिए हुए थे और अर्जुन ने उसका वध कर ही डाला । दुश्शासन वीर था तो भी भीमसेन ने उसका इस प्रकार से वध किया जैसे कोई भोले-भाले हरिण का वध करे और वह चूँ तक न बोले । पाण्डवों की भीषण से भीषण प्रतिज्ञायें बड़ी सुगमता से पूरी होती दीख पड़ती हैं इससे तो यही विचार में आता है कि विधाता सर्वथा कौरववंश के प्रतिकूल है और इतना सब कुछ कराके भी तृप्त नहीं है भविष्य में न मालूम क्या करावेगा ॥ २ ॥ (राजा को देखकर) क्यों अब भी महाराज की मूर्च्छा दूर नहीं हो रही है ? बड़े