वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
DevanagariHindipublished355 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
| पद्यानि | पृष्ठाङ्काः | पद्यानि | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| अ-आ | उ-ऊ | ||
| अकलितमहिमान | २४० | उद्घातक्वणितविलोळ | ९० |
| अकृपणमतिः कामं | ३२९ | उपेक्षितानां मन्दानां | १४४ |
| अक्षतस्य मदापानैः | १५९ | ऊरु करेण परिघट्टयतः | ३१० |
| अत्रैव किं न विशसेयं | २३२ | ए | |
| अद्य प्रभृति वो दत्तं | ३०३ | एकस्य तावत्पाकोऽयं | ११८ |
| अद्य मिथ्याप्रतिज्ञो | १४३ | एकेनापि विनानुजेन | २०८ |
| अद्यैवावां रणमुपगतौ | १९७ | एतज्जलं जलजमील- | ३०३ |
| अन्धोऽनुभूतशत | २१६ | एतेऽपि तस्य कुपितस्य | १०५ |
| अन्योन्यास्फालभिन्न | ४२ | एह्यस्मदर्थहततात | १३१ |
| अपि नाम भवेन्मृत्युः | १६५ | क | |
| अप्रियाणि करोष्येव | २३२ | कथमपि न निषिद्धः | १४२ |
| अयि कर्ण कर्णसुखदां | २१७ | कर्णक्रोधेन युष्मद्विजयि | २३६ |
| अयं पापो यावन्न | १४७ | कर्णदुःशासनवधात् | २६२ |
| अवसानेऽङ्गराजस्य | २६९ | कर्णाननेन्दुस्मरणात् | २२० |
| अश्वत्थामा हत इति | ११० | कर्णािलङ्गनदायी वा | २२४ |
| असमाप्तप्रतिज्ञेऽपि | ३०६ | कर्णेन कर्णसुभगं | २३९ |
| अस्रग्रामविधौ कृती | १९२ | कर्ता द्यूतच्छलानां | २२७ |
| अस्रज्वालावलीढ | १०४ | कलितभुवना मुक्ते | २१० |
| आचार्यस्य त्रिभुवन- | ११९ | कालिन्द्याः पुलिनेषु | ३ |
| आजन्मनो न वितथं | ११४ | काव्यालापसुभाषित- | ३३० |
| आरमारामा विहित- | ३७ | किं कण्ठे शिथिली | ५८ |
| आ शस्त्रग्रहणादकुण्ठ | ४९ | किं नो व्याप्रदिशां | ७२ |
| आशैशवादमुदिनं | ३१५ | किं शिष्याद् गुरुद | १०८ |
| इ | कुरु घनोरु पदानि | ७७ | |
| इन्द्रप्रस्थं वृकप्रस्थं | २६ | कुन्त्या सह युवामद्य | २०३ |
| इयमस्मदुपाश्रयैक- | ५८ | कुर्वन्स्वाहा हतानां | २३६ |