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विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

Vidura Niti Gita Press

महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

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११४ विदुरनीति

मुष्टिसे प्रहार करता है, न झुकाये जा सकनेवाले वर्षाकालीन इन्द्रधनुषको झुकाना चाहता है, पकड़में न आनेवाली सूर्यकी किरणोंको पकड़नेका प्रयास करता है, शासनके अयोग्य पुरुषपर शासन करता है, मर्यादाका उल्लङ्घन करके सन्तुष्ट होता है, शत्रुको सेवा करता है, स्त्री-रक्षाके द्वारा अपनी जीविका चलाता है, याचना करनेके अयोग्य पुरुषसे याचना करता है तथा आत्म-प्रशंसा करता है, अच्छे कुलमें उत्पन्न होकर भी नीच कर्म करता है, दुर्बल होकर भी बलवान्‌से वैर बाँधता है, श्रद्धाहीनको उपदेश करता है, न चाहने योग्य वस्तुको चाहता है, श्वशुर होकर पुत्रवधूके साथ परिहास पसन्द करता है तथा पुत्रवधूकी सहायतासे सङ्कटसे छूटकर भी पुनः उससे अपनी प्रतिष्ठा चाहता है, पर-स्त्रीमें अपने वीर्यका आधान करता है, आवश्यकतासे अधिक स्त्रीकी निन्दा करता है, किसीसे कोई वस्तु पाकर भी 'याद नहीं है' ऐसा कहकर उसे दबाना चाहता है, माँगनेपर दान देकर उसके लिये अपनी डींग हाँकता है और झूठको सही साबित करनेका प्रयास करता है ॥ १—६ ॥

यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्य- स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः। मायाचारो मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ ७ ॥

जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये—यही नीति-धर्म है। कपटका आचरण करनेवालेके साथ कपटपूर्ण बर्ताव करे और अच्छा बर्ताव करने-