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विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

Vidura Niti Gita Press

महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व श्लोक सूची

विदुर नीति

महाभारत उद्योगपर्व से


गीता प्रेस गोरखपुर

CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized By Siddhanta eGangotri Gyaan Kosha

विदुर नीति

म० भा० उद्योगपर्वसे

गीता प्रेस गोरखपुर


गयी है
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वि० नी० १-२-

प्रकाशक—गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर


संवत् २०११ से २०४६ तक २,२०,०००
संवत् २०४६ सत्रहवाँ संस्करण १०,०००


कुल २,३०,०००
( दो लाख तीस हजार )

मूल्य तीन रुपये


मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर

निवेदन

‘विदुरनीति’ महाभारतका एक अत्यन्त प्रसिद्ध और परम उपादेय प्रसङ्ग है। इसमें महामना विदुरजीने राजा धृतराष्ट्रको लोक-परलोकमें कल्याण करनेवाली बहुत-सी बातें समझायी हैं। उद्योगपर्वके आठ अध्याय ३३वेंसे ४०वेंतक इस प्रसङ्गके हैं। विदुरनीतिपर संस्कृत टीकाएँ भी हैं। इसमें व्यवहार, बर्ताव, नीति, सदाचार, धर्म, सुख-दुःख-प्राप्तिके साधन, त्याज्य और ग्राह्य गुणों तथा कर्मोंका निर्णय, त्यागकी महिमा, न्यायका स्वरूप, सत्य, परोपकार, क्षमा, अहिंसा, मित्रके लक्षण, कृतघ्नकी दुर्दशा, निर्लोभता आदिका विशद वर्णन करते हुए राजधर्मका सुन्दर निरूपण किया गया है। यह पुस्तक अपठित, विद्वान्, तरुण, वृद्ध, बालक, स्त्री, शासक, प्रजा, धनी, गरीब, विद्यार्थी, शिक्षक, सेवावर्ती और शुद्ध तथा सुखी जीवनका निर्माण चाहनेवाले प्रत्येक व्यक्तिके कामकी है। श्लोकोंका अर्थ बड़ी सरल भाषामें किया गया है। आशा है, इससे भारतके सभी वर्गों तथा श्रेणियोंके नर-नारी लाभ उठावेंगे।

श्रावण कृष्ण ८, वि० २०११
गोरखपुर

निवेदक—
हनुमानप्रसाद पोद्दार

श्रीहरिः

विदुरनीतिके प्रधान विषयोंकी सूची

पहला अध्याय

श्लोकविषयपृष्ठ
१—६धृतराष्ट्रकी आज्ञासे द्वारपालका विदुरजीको बुलाकर उनके पास पहुँचाना२१-२२
७-८विदुरका चिन्तामग्न धृतराष्ट्रसे अपने बुलानेका कारण पूछना२२-२३
९-१२धृतराष्ट्रका विदुरको अपनी चिन्ता बताकर उनसे श्रेयका उपाय पूछना२३-२४
१३-१९किन दोषोंके कारण मनुष्यको चिन्ता और जागरण करने पड़ते हैं, यह बताकर विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरके प्रति किये गये अन्यायके लिये उलाहना देना२४-२६
२०-३४पण्डित एवं पाण्डित्यका लक्षण२६-२९
३५-४४मूढ़की पहचान२९-३१
४५पण्डित किसे कहते हैं३१
४६घरके लोगोंको न बाँटकर अकेले उत्तम अन्न-वस्त्रका उपभोग करनेकी निन्दा३१-३२
४७कर्ता ही दोषका भागी होता है३२
४८-४९बुद्धिकी प्रबलता और उसका सदुपयोग३२
५०मन्त्रविप्लवसे हानि३३
५१अकेला क्या-क्या न करे३३
५२सत्यकी प्रशंसा३३
५३-५६क्षमाकी प्रशंसा३३-३४
५७धर्म, क्षमा, विद्या और अहिंसाकी प्रशंसा३४
५८पृथ्वी किन दो व्यक्तियोंको खा जाती है३४

( ५ )

श्लोकविषयपृष्ठ
५९कटुवचन न बोलने और दुष्टोंका आदर न करनेकी प्रशंसा३५
६०दूसरोंके विश्वासपर चलनेवाले दो प्रकारके व्यक्ति३५
६१दो काँटे३५
६२किन दो व्यक्तियोंकी शोभा नहीं होती३५
६३दो स्वर्गसे भी ऊँचे स्थान पानेवाले व्यक्ति३५-३६
६४धनके दो दुरुपयोग३६
६५किन दोको पानीमें डुबो देना चाहिये३६
६६सूर्यमण्डलका भेदन करनेवाले दो पुरुष३६
६७-६८त्रिविध उपाय और पुरुष३६-३७
६९धनके तीन अनधिकारी३७
७०तीन विनाशकारी दोष३७
७१नरकके तीन द्वार३७
७२शत्रुके सङ्कटसे छूटना बलप्राप्ति, राज्य-प्राप्ति और पुत्र-प्राप्ति—तीनोंके बराबर है३७
७३तीन प्रकारके शरणागतोंका त्याग न करे३८
७४राजाके द्वारा त्यागनेयोग्य चार प्रकारके मनुष्य३८
७५घरमें रहनेयोग्य चार प्रकारके मनुष्य३८
७६-७७तत्काल फल देनेवाली चार बातें३८-३९
७८भयको दूर करनेवाले चार कर्म३९
७९सेवन करनेयोग्य पाँच अग्नि४०
८०पाँचकी पूजासे विशुद्ध यशकी प्राप्ति४१
८१राजाके पीछे लगे रहनेवाले पाँच व्यक्ति४०
८२पाँच इन्द्रियोंमेंसे एकके भी दोषयुक्त होनेसे हानि४०
८३-८५त्याग देनेयोग्य छः दोष और छः प्रकारके व्यक्ति४०-४१
८६-८७त्याग न करनेयोग्य छः गुण और जीवलोकके छः सुख४१

( ६ )

श्लोकविषयपृष्ठ
८८काम-क्रोध आदि छः शत्रुओंको जीतनेसे लाभ४१
८९-९०छः प्रकारके लोगोंके छः आश्रय४१-४२
९१स्वयं देख-रेख न करनेसे छः वस्तुओंका नाश४२
९२-९३छः प्रकारके व्यक्तियोंद्वारा छः तरहके मनुष्योंकी अवहेलना४२
९४जीवलोकके छः सुख४२-४३
९५दुःखके भागी छः व्यक्ति४३
९६-९७राजाके त्यागनेयोग्य सात दोष४३
९८-१००नष्ट होनेवाले मनुष्यके आठ प्रकारके लक्षण४३-४४
१०१-१०३हर्षके सार और लौकिक सुखके साधनकी आठ बातें४४
१०४पुरुषोंको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण४४-४५
१०५नौ दरवाजेका घर४५
१०६-१०७धर्मको न जाननेवाले दस प्रकारके मनुष्य४५
१०८-११०प्रह्लादका सुधन्वासहित अपने पुत्र विरोचनको उपदेश—सब लोग किसको प्रमाण मानते हैं तथा सम्पूर्ण राजलक्ष्मी किसकी सेवामें चली जाती हैं४५-४६
१११-११५भीरु पुरुषका लक्षण, किसके शत्रु परास्त हो जाते हैं, कौन सदा सुखी रहता है और किसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है४६-४८
११६-११९लोग किसको प्यारा बना लेते हैं, सत्पुरुष किसे श्रेष्ठ स्वभावका बताते हैं तथा कौन महान् जनसमुदायपर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है४८-४९
१२०-१२३कौन प्रधान है, देवता किसके अभ्युदयकी सिद्धि करते हैं, किस विद्वान्की नीति श्रेष्ठ है और अनर्थ किसको त्याग देते हैं४९-५१

( ७ )

श्लोकविषयपृष्ठ
१२४-१२६किसका थोड़ा-सा भी काम बिगड़ने नहीं पाता, कौन अपनी जातिवालोंमें अधिक ख्याति लाभ करता है और कौन सूर्यके समान शोभा पाता है५१-५२
१२७-१२८विदुरका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंके गुण बताकर उन्हें आधा राज्य देनेके लिये अनुरोध करना ...५२

दूसरा अध्याय

श्लोकविषयपृष्ठ
१-३धृतराष्ट्रका व्याकुल होकर अपने हितकी बात पूछना५३-५४
४-५विदुरके द्वारा हितकी बात कहनेकी प्रतिज्ञा ...५४
६-७असत् उपायोंसे सफलता मिले तो भी उधर मन न लगावे और अच्छे उपायोंसे असफलता होती हो तो भी इसके लिये मनमें ग्लानि न करे—इसका प्रतिपादन५४-५५
८-९प्रयोजन, परिणाम और उन्नतिका विचार करके कार्य करनेकी आज्ञा ... ...५५
१०-११कौन राज्यमें स्थिर नहीं रहता और कौन राज्य पाता है, इसका विवेचन ... ...५५
१२-१३उद्दण्डतासे सम्पत्तिका नाश और परिणामका विचार न करनेसे हानि ...५५-५६
१४पचने योग्य और परिणाममें हितकर अन्न खानेकी सलाह ... ...५६
१५-१६वृक्षके कच्चे और पके फलोंको तोड़नेसे हानि और लाभ ... ... ...५६
१७-१८राजाको प्रजाकी रक्षा करते हुए ही उससे धन लेना चाहिये, इस विषयमें भ्रमर और मालीका दृष्टान्त५७
१९-२०लाभ-हानिका विचार करके कार्य करे या न करे, व्यर्थ कर्मोंका आरम्भ न करे ... ...५७

( ८ )

श्लोकविषयपृष्ठ
२१–२२प्रजा किसे नहीं चाहती तथा शीघ्र आरम्भ करने-योग्य कार्य ... ... ...५७-५८
२३–२६प्रजा किससे अनुराग रखती है, राजा अपनेको किस प्रकार रखे, लोग किस राजासे प्रसन्न रहते हैं तथा प्रजा किसे त्याग देती है, इन सब बातोंका विवेचन५८-५९
२७–२८अन्यायसे राज्यका नाश और धर्मसे धन-धान्य तथा ऐश्वर्यकी वृद्धि ... ...५९
२९धर्मके त्याग और अधर्मके अनुष्ठानसे हानि ...५९
३०–३१दूसरोंके राष्ट्रका नाश करनेकी अपेक्षा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये किये गये प्रयत्नका औचित्य, धर्ममूलक लक्ष्मीकी स्थिरता ... ...६०
३२–३३सब ओरसे सारभूत बातोंको ग्रहण करनेकी आवश्यकता ... ...६०
३४–३७कौन कैसे देखते हैं, अविनयसे हानि और विनयसे लाभ तथा अपनेसे बलवान्‌के सामने नतमस्तक होनेकी नीतिका प्रतिपादन ...६०-६१
३८–४०कौन किसके रक्षक हैं एवं किससे किसकी रक्षा होती है—इसका विवेचन ... ...६१-६२
४१–४३कुलकी अपेक्षा सदाचारकी श्रेष्ठता, ईर्ष्या एक असाध्य रोग है, किससे डरे और क्या न पीये ...६२
४४–४६असत् पुरुषोंकी निन्दा और सत् पुरुषोंकी प्रशंसा६३
४७–४८शीलकी श्रेष्ठता ... ... ...६३-६४
४९–५१धनाढ्य, मध्यवित्त तथा दरिद्रोंके भोजन ...६४
५२–५३अधम, मध्यम तथा उत्तम पुरुषोंके भयका हेतु, ऐश्वर्यमदकी निन्दा ... ...६४-६५
५४–५५इन्द्रियोंको वशमें न रखनेसे हानि ... ...६५

( ९ )

श्लोकविषयपृष्ठ
५६-५७इन्द्रियसहित मन और अमात्योंको जीतकर ही शत्रुओं-पर विजय पानेकी चेष्टाके औचित्यका प्रतिपादन६५-६६
५८-५९लक्ष्मी किसकी अत्यन्त सेवा करती हैं, भीरु पुरुष कैसे सुखपूर्वक यात्रा करता है६६
६०-६५मन और इन्द्रियोंको न जीतनेसे हानि और जीतनेसे लाभ६६-६७
६६-६९काम और क्रोधसे विज्ञानका लोप, धर्म और अर्थका विचार करके विजयसाधन-सामग्रीके संग्रहकी आवश्यकता, आन्तरिक शत्रुओंको जीतकर ही बाह्य शत्रुओंको जीतनेकी इच्छाका समर्थन६८
७०-७३दुष्ट पुरुषोंसे मेल करनेकी मनाही, पाँचों इन्द्रियोंको न जीतनेसे विपत्तिकी सम्भावना तथा दुरात्मा एवं अधम पुरुषोंमें अनसूया आदि उत्तम गुणोंका अभाव६८-६९
७४-७५क्षमाका महत्त्व६९-७०
७६-८०विशेष अर्थयुक्त विचित्र वाणीकी दुर्लभता, मधुर वाणीसे लाभ और कटु वचनसे हानि७०-७१
८१-८३बुद्धिके नष्ट होनेसे पराजय एवं विनाश७१-७२
८४-८६विदुरका युधिष्ठिरके गुण बताकर राजा धृतराष्ट्रका ध्यान उनकी ओर आकृष्ट करना७२

तीसरा अध्याय

श्लोकविषयपृष्ठ
धृतराष्ट्रका विदुरसे पुनः धर्मार्थयुक्त वचन कहनेका अनुरोध७३
२-३विदुरके द्वारा उपदेश, आर्जव ( कोमलतापूर्ण बर्ताव ) की प्रशंसा, धृतराष्ट्रको आर्जव नामक गुणको अपनानेका आदेश७३

( १० )

श्लोकविषयपृष्ठ
इस लोकमें पुण्यकीर्ति होनेसे मनुष्यकी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा ... ... ...७३-७४
५–३८केशिनीके लिये सुधन्वा और विरोचनमें अपनी-अपनी श्रेष्ठताको लेकर विवाद, दोनोंका निर्णयके लिये प्रह्लादके पास जाना, प्रह्लादके द्वारा सुधन्वाका सत्कार, उलटा न्याय देनेवाले वक्ताको प्राप्त होनेवाले दोष, प्रह्लादके द्वारा सुधन्वाकी श्रेष्ठताका निर्णय और सुधन्वाका विरोचनको प्राणदान७४–८३
३९विदुरका धृतराष्ट्रसे भूमिके लिये झूठ न बोलनेका अनुरोध ... ... ...८३
४०–४१उत्तम एवं कल्याणमयी बुद्धिसे रक्षा और सम्पूर्ण अर्थोंकी सिद्धि ... ... ...८३
४२–४५कपटीको वेद भी पापसे नहीं बचा सकते, सबके लिये त्याग देनेयोग्य दुर्गुण, साक्षी न बनानेयोग्य सात प्रकारके व्यक्ति तथा भयको दूर करनेवाले चार कर्म८३–८५
४६–४८ब्रह्महत्यारोंके समान पापी ... ... ...८५
४९–५०किसकी कब परीक्षा होती है और कौन क्या हर लेता है८५–८६
५१–५२लक्ष्मीकी उत्पत्ति, वृद्धि, स्थिरता और सुरक्षाके हेतु तथा पुरुषको उद्दीप्त करनेवाले आठ सद्गुण ...८६
५३–५५राजाके द्वारा किये हुए सत्कारकी महत्ता तथा स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाले आठ सद्गुण ...८७
५६–५७धर्मके आठ मार्ग ... ... ...८८
५८वृद्धोंसे सभाकी, धर्मसे वृद्धोंकी, सत्यसे धर्मकी और निश्छलतासे सत्यकी प्रतिष्ठा ... ... ...८८
५९–६५स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले दस साधन, पापकी निन्दा और पुण्यकी प्रशंसा ... ... ...८८–९०

( ११ )

श्लोकविषयपृष्ठ
६६–६८प्रज्ञाकी प्रशंसा, भावी सुखके लिये पहलेसे ही सत्कर्म करनेकी प्रेरणा ... ... ...९०
६९–७१किसकी कब प्रशंसा की जाती है, अधर्मद्वारा प्राप्त हुए धनसे दोष नहीं छिपता तथा कौन किसका शासक है, इन बातोंका विवेचन ... ...९१
७२–७४किन-किनका मूल नहीं जाना जा सकता, कौन दीर्घ कालतक पृथ्वीका पालन करता है और कौन मनुष्य पृथ्वीसे सुवर्णरूपी पुष्पका चयन करते हैं ...९१-९२
७५तीन प्रकारके कार्य ... ...९२
७६-७७दुर्योधन आदिपर राज्यका भार रखनेसे उन्नतिकी सम्भावना नहीं, पाण्डवोंके साथ पुत्रवत् व्यवहार कीजिये—यह विदुरजीकी धृतराष्ट्रको सलाह ...९२

चौथा अध्याय

१–३दत्तात्रेय और साध्योंका संवाद—साध्योंका हंसरूपसे विचरनेवाले दत्तात्रेयजीसे उपदेश देनेका अनुरोध९३-९४
हंसरूपसे दत्तात्रेयजीका उपदेश—धृति, शम और सत्य-धर्मके अनुसरणकी आवश्यकता, प्रिय और अप्रियको आत्मवत् समझनेकी प्रेरणा ... ...९४
५–८क्षमाशीलका प्रभाव, दूसरोंको गाली देने और कटुवचन कहने आदिका निषेध, कटुवचन और कटुवादीकी निन्दा ... ... ..:९४-९५
९–११गाली और कटुवचनके सह लेनेसे पुण्यकी पुष्टि, जैसा सङ्ग वैसा रङ्ग तथा देवता किसके आगमनकी बाट जोहते हैं, इत्यादि बातोंका विवेचन ...९५-९६

( १२ )

श्लोकविषयपृष्ठ
१२-१५वाणीकी चार विशेषताएँ—जैसा साथ वैसा भाव, निवृत्तिसे मुक्ति और दुःखका अभाव तथा समताकी प्रशंसा ... ... ...९६-९७
१६-२१उत्तम, मध्यम और अधम मनुष्योंकी पहचान तथा अधम पुरुषोंकी सेवाको त्यागनेकी आज्ञा ...९७-९९
२२-२४धृतराष्ट्रका विदुरसे महाकुलीन पुरुषोंके लक्षण पूछना और विदुरके द्वारा उनके प्रश्नोंका उत्तर९९-१००
२५-२८किन-किन कर्मोंसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं—इसका प्रतिपादन ... ...१००-१०१
२९-३१सदाचार ही कुलीनताका मूल है, सदाचारके नाशसे सब कुछ नष्ट हो जाता है ...१०१
३२-३३राजकुल तथा राजसभामें किन लोगोंका होना अभीष्ट नहीं है ... ...१०१-१०२
३४-३५अतिथि-सत्कारके लिये सर्वसुलभ वस्तुएँ तथा उनका सदुपयोग ... ...१०२
३६-३८महाकुलीन पुरुषकी प्रशंसा, उत्तम मित्रके लक्षण१०२-१०३
३९-४०चञ्चलचित्त पुरुषके पास न तो मित्र ठहरते हैं और न उसे अर्थकी प्राप्ति होती है—इसका प्रतिपादन१०३
४१-४५दुष्ट पुरुषोंके स्वभाव, कृतघ्नोंकी निन्दा, मित्रोंके सत्कारकी आवश्यकता तथा संताप और शोकसे हानि१०४
४६-४७हर्ष और शोक त्याज्य हैं ... ...१०५
४८इन्द्रियोंकी विषयपरायणतासे बुद्धिका ह्रास ...१०५
४९-५०धृतराष्ट्रके उद्वेगपूर्ण वचन और उद्वेगशून्य शान्तपदकी जिज्ञासा ... ...१०६

( १३ )

श्लोकविषयपृष्ठ
५१-५४विदुरजीका धृतराष्ट्रको शान्ति और सुखके उपाय बताना ... ... ...१०६-१०७
५५-५७आपसमें वैर-विरोध रखनेवाले लोगोंको सुख-शान्तिकी दुर्लभता ... ...१०७-१०८
५८-६०जाति-बन्धुओंसे सम्भावित भय, सामूहिक शक्तिकी प्रबलता, आपसकी फूटसे दुःख और एकतासे सुख१०८-१०९
६१ब्राह्मणों, स्त्रियों, जाति-भाइयों और गोओंपर बल दिखानेसे पतन ... ...१०९
६२-६५संघ-शक्तिकी प्रशंसा ... ...१०९-११०
६६-६७कौन-कौन अवध्य हैं और मनुष्यमें क्या गुण है११०
६८-६९क्रोधको पीनेसे शान्ति, रोगीका सुखका अभाव११०-१११
७०-७४धृतराष्ट्रको उलाहना देते हुए विदुरका उनसे कौरव-पाण्डवमें मेल एवं सन्धि करानेका आग्रह१११-११२

पाँचवाँ अध्याय

श्लोकविषयपृष्ठ
१-६यमराजके दूत किन्हें नरकमें ले जाते हैं ...११३-११४
७-८जो जैसा करे उसके साथ वैसे बर्तावकी नीति, कौन क्या नष्ट करता है ...११४-११५
९-११मनुष्य पूरे सौ वर्षोंतक क्यों नहीं जीवित रह पाता, धृतराष्ट्रका यह प्रश्न और विदुरके द्वारा इसका उत्तर ... ...११५-११६
१२-१३ब्रह्महत्यारोंके समान पापी ...११६

( १४ )

श्लोकविषयपृष्ठ
१४-१६स्वर्गलोकके अधिकारी विद्वान्‌के गुण, अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवालेकी दुर्लभता तथा राजाका सच्चा सहायक ... ...११६-११७
१७-१८आत्म-कल्याणके लिये सब कुछ त्यागने तथा धन एवं स्त्रीद्वारा भी आत्मरक्षा करनेका आदेश ...११७
१९-२१जुएको वैरका कारण बताते हुए विदुरका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंके प्रति किये जानेवाले दुर्व्यवहारके लिये उलाहना ... ... ...११७-११८
२२-२३राजा भृत्योंका विश्वासपात्र कैसे बनता है, सेवकोंकी जीविका बन्द करनेसे हानि ...११८-११९
२४-२७सुयोग्य सहायकोंकी आवश्यकता, स्वामीके कृपापात्र सेवकके गुण, त्यागनेयोग्य भृत्यके दुर्गुण तथा दूतके आठ गुण ... ...११९-१२०
२८-२९सावधान मनुष्य क्या-क्या न करे ...१२०-१२१
३०किनके साथ लेन-देनका व्यवहार न करे ...१२१
३१-३२पुरुषको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण तथा राजसम्मानकी महत्ता ... ...१२१-१२२
३३-३४स्नानसे दस और स्वल्पाहारसे छः लाभ ...१२२
३५-३६किसको अपने घरमें न ठहरने दे और किन लोगोंसे कभी सहायताकी याचना न करे ...१२२-१२३
३७सेवन करनेके अयोग्य छः प्रकारके मनुष्य ...१२३
३८-३९धन और सहायक एक-दूसरेके आश्रित हैं, वानप्रस्थ-आश्रम कब ग्रहण करे ...१२३-१२४

( १५ )

श्लोकविषयपृष्ठ
४०-४१सम्पूर्ण सिद्धियोंका मूलमन्त्र क्या है, किसे अपनी जीविकाके नाशका भय नहीं होता ...१२४
४२-४६पाण्डवोंके साथ होनेवाले युद्धका दुष्परिणाम बताकर उनके परस्पर मेलसे होनेवाले लाभका दिग्दर्शन कराना ... ...१२४-१२६
४७पापासक्त मनुष्य दूसरोंके दुर्गुणपर ही दृष्टि रखते हैं१२६
४८-५०धर्माचरणसे अर्थसिद्धि, बुद्धिको पापसे दूर रखनेमें लाभ; धर्म, अर्थ और कामके समयानुसार सेवनका फल ... ...१२६
५१राजलक्ष्मीका अधिकारी कौन है ...१२७
५२-५५मनुष्योंके पाँच प्रकारके बल ...१२७
५६-५७महान् शक्तिशालीसे वैर न करे, विद्वान् पुरुष किनपर भरोसा नहीं करते ...१२७-१२८
५८-५९बुद्धिकी प्रबलता, किनका अनादर न करे ...१२८
६०-६२कुटुम्बीजन काठमें छिपी हुई आगके समान हैं, उनके फूटनेसे सब कुछ भस्म हो सकता है—इसका प्रतिपादन ... ...१२८-१२९
६३-६४कौरव और पाण्डवोंमें लता और वृक्षका तथा वन और सिंहका-सा सम्बन्ध है, अतः इन्हें मिलकर रहना चाहिये, यह धृतराष्ट्रको बताना ...१२९

छठा अध्याय

माननीय वृद्ध पुरुषोंके आनेपर खड़े होने और प्रणाम करनेकी आवश्यकता ...१३०

( १६ )

श्लोकविषयपृष्ठ
२-३अतिथि-सत्कारका क्रम और अतिथिके सत्कार-ग्रहण न करनेपर गृहस्थ-जीवनकी व्यर्थता ...१३०-१३१
४-५पैर न धोनेयोग्य अतिथि, न बेचनेयोग्य वस्तुएँ१३१
६-७सच्चे संन्यासी तथा पुण्यात्मा वानप्रस्थीका लक्षण१३१-१३२
८-९बुद्धिमान्‌की बड़ी बाँहें होती हैं, राजा कहीं भी अधिक विश्वास न करे ... ...१३२
१०-११मनुष्यको कैसा होना चाहिये, स्त्रियोंके विशेष संरक्षणकी आवश्यकता ... ...१३२-१३३
१२-१४किसको किसकी रक्षाका भार सौंपे, कौन किससे उत्पन्न हुआ है और कुलीन संत कैसे होते हैं—इसका विवेचन ... ...१३३-१३४
१५-२१कौन राजा दीर्घकालतक ऐश्वर्य भोगता है, अपनी मन्त्रणा दूसरोंपर कैसे प्रकट नहीं होती, गुप्त-मन्त्रणाके स्थान, मन्त्री न बनानेयोग्य व्यक्ति, मन्त्रीका उत्तरदायित्व तथा मन्त्रणाकी रक्षासे ही राजाको सिद्धिकी प्राप्ति ...१३४-१३५
२२-२४बुरे कर्मोंका दुष्परिणाम, उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे लाभ तथा मन्त्रणा सुननेका अधिकारी ...१३५
२५-२६किस राजाके अधीन पृथ्वी होती है और किसे वह धन देती है ... ...१३६
२७राजा अकेले सब कुछ न हड़प ले ...१३६
२८-२९किसको कौन जानता है, वशमें आये हुए शत्रु का वध आवश्यक है ...१३६-१३७
३०-३३कहाँ-कहाँ क्रोधको रोकना चाहिये, निरर्थक कलहके त्यागसे लाभ, कैसे राजाको प्रजा नहीं चाहती, विद्वान् पुरुषकी श्रेष्ठता ...१३७

( १७ )

श्लोकविषयपृष्ठ
३३-३५मूर्ख और दुष्टके बर्ताव तथा उसपर विपत्तिकी सम्भावना१३८
३६-३७सम्पूर्ण भूतोंको अपना बना लेनेवाले गुण, श्रेष्ठ राजाको बिना धनके भी सहायक मिलते हैं१३८
३८-३९लक्ष्मीको बढ़ानेवाले सात गुण तथा त्याग देने-योग्य राजा१३८-१३९
४०-४१निर्दोषको सतानेसे हानि, जिससे अपनी हानि हो उन्हें प्रसन्न रखनेकी आवश्यकता१३९
४२-४३किनके हाथोंमें पड़े हुए पदार्थ संशयमें पड़ जाते हैं तथा कौन लोग विपत्तिके समुद्रमें डूबते हैं१३९
४४-४५कौन पण्डित है, किस मनुष्यका जीवन खतरेमें होता है१४०
४६-४७पाण्डवोंको त्यागकर दुर्योधनको राज्य देना उसके पतनका कारण होगा—यह विदुरजीकी चेतावनी१४०
सातवाँ अध्याय
मनुष्य प्रारब्धके अधीन है—यह धृतराष्ट्रका कथन१४१
२-४विदुरका उपदेश—समयके विपरीत बोलनेसे अपमान, कौन प्रिय होता है, प्रिय और अप्रिय व्यक्तिके कार्योंमें दृष्टिभेद१४१-१४२
एक दुर्योधनके न त्यागनेसे सौ पुत्रोंके नाशकी सम्भावना१४२
६-७क्षय और वृद्धिकी व्याख्या१४२
८-९गुणहीन धनियोंके त्यागकी आशा, धृतराष्ट्रका पुत्रको त्यागनेमें अपनी असमर्थता बताना१४३

( १८ )

श्लोकविषयपृष्ठ
१०-१३गुणवान् और विनयशीलका स्वभाव, दुष्टोंसे लेन-देन करनेमें दोष तथा उनको साथ रखनेकी भी निन्दा१४३-१४४
१४-१६महान् दोषोंसे युक्त पुरुष त्याज्य हैं, नीच पुरुषोंका प्रेम नश्वर होता है, नीचका स्वभाव और नीच पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देनेकी प्रेरणा ...१४४-१४५
१७-३२जाति-भाइयोंकी रक्षा और सत्कारका महत्त्व बताते हुए उनसे मिलकर रहने और पाण्डवोंको उनका न्यायोचित हक देनेके लिये धृतराष्ट्रसे विदुरजीका अनुरोध ... ...१४५-१४८
३३-३५कौन दीर्घकालतक यशका भागी होता है, कौनसा ज्ञान व्यर्थ है, किसका अभ्युदय और किसका पतन होता है ... ...१४८-१४९
३६-३८मन्त्रभेदके छः द्वार और उन्हें बन्द रखनेका महत्त्व१४९
३९-४१शास्त्रज्ञान और वृद्धोंकी सेवाका महत्त्व, कौन वस्तु कहाँ नष्ट होती है और बुद्धिमान् पुरुष कैसी मैत्री करे ... ...१५०
४२-४३किस गुणसे किस अवगुणका नाश होता है और कुलकी परीक्षा कैसे की जाती है ...१५०-१५१
४४-४७स्वतःप्राप्त भोगसामग्रीका विरोध न करे, कैसे सुहृद्की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये, कौन सैकड़ों कुलीनोंसे बढ़कर हैं और किनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती ... ...१५१
४८-५०खोटी बुद्धिवालेको त्यागनेकी आवश्यकता, किनके साथ मित्रता न करे और मित्र कैसा होना चाहिये१५२