भारतकोश
विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

Vidura Niti Gita Press

महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

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श्लोकविषयपृष्ठ
५६-५७इन्द्रियसहित मन और अमात्योंको जीतकर ही शत्रुओं-पर विजय पानेकी चेष्टाके औचित्यका प्रतिपादन६५-६६
५८-५९लक्ष्मी किसकी अत्यन्त सेवा करती हैं, भीरु पुरुष कैसे सुखपूर्वक यात्रा करता है६६
६०-६५मन और इन्द्रियोंको न जीतनेसे हानि और जीतनेसे लाभ६६-६७
६६-६९काम और क्रोधसे विज्ञानका लोप, धर्म और अर्थका विचार करके विजयसाधन-सामग्रीके संग्रहकी आवश्यकता, आन्तरिक शत्रुओंको जीतकर ही बाह्य शत्रुओंको जीतनेकी इच्छाका समर्थन६८
७०-७३दुष्ट पुरुषोंसे मेल करनेकी मनाही, पाँचों इन्द्रियोंको न जीतनेसे विपत्तिकी सम्भावना तथा दुरात्मा एवं अधम पुरुषोंमें अनसूया आदि उत्तम गुणोंका अभाव६८-६९
७४-७५क्षमाका महत्त्व६९-७०
७६-८०विशेष अर्थयुक्त विचित्र वाणीकी दुर्लभता, मधुर वाणीसे लाभ और कटु वचनसे हानि७०-७१
८१-८३बुद्धिके नष्ट होनेसे पराजय एवं विनाश७१-७२
८४-८६विदुरका युधिष्ठिरके गुण बताकर राजा धृतराष्ट्रका ध्यान उनकी ओर आकृष्ट करना७२

तीसरा अध्याय

श्लोकविषयपृष्ठ
धृतराष्ट्रका विदुरसे पुनः धर्मार्थयुक्त वचन कहनेका अनुरोध७३
२-३विदुरके द्वारा उपदेश, आर्जव ( कोमलतापूर्ण बर्ताव ) की प्रशंसा, धृतराष्ट्रको आर्जव नामक गुणको अपनानेका आदेश७३