विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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( ६ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ८८ | काम-क्रोध आदि छः शत्रुओंको जीतनेसे लाभ | ४१ |
| ८९-९० | छः प्रकारके लोगोंके छः आश्रय | ४१-४२ |
| ९१ | स्वयं देख-रेख न करनेसे छः वस्तुओंका नाश | ४२ |
| ९२-९३ | छः प्रकारके व्यक्तियोंद्वारा छः तरहके मनुष्योंकी अवहेलना | ४२ |
| ९४ | जीवलोकके छः सुख | ४२-४३ |
| ९५ | दुःखके भागी छः व्यक्ति | ४३ |
| ९६-९७ | राजाके त्यागनेयोग्य सात दोष | ४३ |
| ९८-१०० | नष्ट होनेवाले मनुष्यके आठ प्रकारके लक्षण | ४३-४४ |
| १०१-१०३ | हर्षके सार और लौकिक सुखके साधनकी आठ बातें | ४४ |
| १०४ | पुरुषोंको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण | ४४-४५ |
| १०५ | नौ दरवाजेका घर | ४५ |
| १०६-१०७ | धर्मको न जाननेवाले दस प्रकारके मनुष्य | ४५ |
| १०८-११० | प्रह्लादका सुधन्वासहित अपने पुत्र विरोचनको उपदेश—सब लोग किसको प्रमाण मानते हैं तथा सम्पूर्ण राजलक्ष्मी किसकी सेवामें चली जाती हैं | ४५-४६ |
| १११-११५ | भीरु पुरुषका लक्षण, किसके शत्रु परास्त हो जाते हैं, कौन सदा सुखी रहता है और किसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है | ४६-४८ |
| ११६-११९ | लोग किसको प्यारा बना लेते हैं, सत्पुरुष किसे श्रेष्ठ स्वभावका बताते हैं तथा कौन महान् जनसमुदायपर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है | ४८-४९ |
| १२०-१२३ | कौन प्रधान है, देवता किसके अभ्युदयकी सिद्धि करते हैं, किस विद्वान्की नीति श्रेष्ठ है और अनर्थ किसको त्याग देते हैं | ४९-५१ |