विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
( ६ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ८८ | काम-क्रोध आदि छः शत्रुओंको जीतनेसे लाभ | ४१ |
| ८९-९० | छः प्रकारके लोगोंके छः आश्रय | ४१-४२ |
| ९१ | स्वयं देख-रेख न करनेसे छः वस्तुओंका नाश | ४२ |
| ९२-९३ | छः प्रकारके व्यक्तियोंद्वारा छः तरहके मनुष्योंकी अवहेलना | ४२ |
| ९४ | जीवलोकके छः सुख | ४२-४३ |
| ९५ | दुःखके भागी छः व्यक्ति | ४३ |
| ९६-९७ | राजाके त्यागनेयोग्य सात दोष | ४३ |
| ९८-१०० | नष्ट होनेवाले मनुष्यके आठ प्रकारके लक्षण | ४३-४४ |
| १०१-१०३ | हर्षके सार और लौकिक सुखके साधनकी आठ बातें | ४४ |
| १०४ | पुरुषोंको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण | ४४-४५ |
| १०५ | नौ दरवाजेका घर | ४५ |
| १०६-१०७ | धर्मको न जाननेवाले दस प्रकारके मनुष्य | ४५ |
| १०८-११० | प्रह्लादका सुधन्वासहित अपने पुत्र विरोचनको उपदेश—सब लोग किसको प्रमाण मानते हैं तथा सम्पूर्ण राजलक्ष्मी किसकी सेवामें चली जाती हैं | ४५-४६ |
| १११-११५ | भीरु पुरुषका लक्षण, किसके शत्रु परास्त हो जाते हैं, कौन सदा सुखी रहता है और किसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है | ४६-४८ |
| ११६-११९ | लोग किसको प्यारा बना लेते हैं, सत्पुरुष किसे श्रेष्ठ स्वभावका बताते हैं तथा कौन महान् जनसमुदायपर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है | ४८-४९ |
| १२०-१२३ | कौन प्रधान है, देवता किसके अभ्युदयकी सिद्धि करते हैं, किस विद्वान्की नीति श्रेष्ठ है और अनर्थ किसको त्याग देते हैं | ४९-५१ |
( ७ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १२४-१२६ | किसका थोड़ा-सा भी काम बिगड़ने नहीं पाता, कौन अपनी जातिवालोंमें अधिक ख्याति लाभ करता है और कौन सूर्यके समान शोभा पाता है | ५१-५२ |
| १२७-१२८ | विदुरका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंके गुण बताकर उन्हें आधा राज्य देनेके लिये अनुरोध करना ... | ५२ |
दूसरा अध्याय
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-३ | धृतराष्ट्रका व्याकुल होकर अपने हितकी बात पूछना | ५३-५४ |
| ४-५ | विदुरके द्वारा हितकी बात कहनेकी प्रतिज्ञा ... | ५४ |
| ६-७ | असत् उपायोंसे सफलता मिले तो भी उधर मन न लगावे और अच्छे उपायोंसे असफलता होती हो तो भी इसके लिये मनमें ग्लानि न करे—इसका प्रतिपादन | ५४-५५ |
| ८-९ | प्रयोजन, परिणाम और उन्नतिका विचार करके कार्य करनेकी आज्ञा ... ... | ५५ |
| १०-११ | कौन राज्यमें स्थिर नहीं रहता और कौन राज्य पाता है, इसका विवेचन ... ... | ५५ |
| १२-१३ | उद्दण्डतासे सम्पत्तिका नाश और परिणामका विचार न करनेसे हानि ... | ५५-५६ |
| १४ | पचने योग्य और परिणाममें हितकर अन्न खानेकी सलाह ... ... | ५६ |
| १५-१६ | वृक्षके कच्चे और पके फलोंको तोड़नेसे हानि और लाभ ... ... ... | ५६ |
| १७-१८ | राजाको प्रजाकी रक्षा करते हुए ही उससे धन लेना चाहिये, इस विषयमें भ्रमर और मालीका दृष्टान्त | ५७ |
| १९-२० | लाभ-हानिका विचार करके कार्य करे या न करे, व्यर्थ कर्मोंका आरम्भ न करे ... ... | ५७ |
( ८ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २१–२२ | प्रजा किसे नहीं चाहती तथा शीघ्र आरम्भ करने-योग्य कार्य ... ... ... | ५७-५८ |
| २३–२६ | प्रजा किससे अनुराग रखती है, राजा अपनेको किस प्रकार रखे, लोग किस राजासे प्रसन्न रहते हैं तथा प्रजा किसे त्याग देती है, इन सब बातोंका विवेचन | ५८-५९ |
| २७–२८ | अन्यायसे राज्यका नाश और धर्मसे धन-धान्य तथा ऐश्वर्यकी वृद्धि ... ... | ५९ |
| २९ | धर्मके त्याग और अधर्मके अनुष्ठानसे हानि ... | ५९ |
| ३०–३१ | दूसरोंके राष्ट्रका नाश करनेकी अपेक्षा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये किये गये प्रयत्नका औचित्य, धर्ममूलक लक्ष्मीकी स्थिरता ... ... | ६० |
| ३२–३३ | सब ओरसे सारभूत बातोंको ग्रहण करनेकी आवश्यकता ... ... | ६० |
| ३४–३७ | कौन कैसे देखते हैं, अविनयसे हानि और विनयसे लाभ तथा अपनेसे बलवान्के सामने नतमस्तक होनेकी नीतिका प्रतिपादन ... | ६०-६१ |
| ३८–४० | कौन किसके रक्षक हैं एवं किससे किसकी रक्षा होती है—इसका विवेचन ... ... | ६१-६२ |
| ४१–४३ | कुलकी अपेक्षा सदाचारकी श्रेष्ठता, ईर्ष्या एक असाध्य रोग है, किससे डरे और क्या न पीये ... | ६२ |
| ४४–४६ | असत् पुरुषोंकी निन्दा और सत् पुरुषोंकी प्रशंसा | ६३ |
| ४७–४८ | शीलकी श्रेष्ठता ... ... ... | ६३-६४ |
| ४९–५१ | धनाढ्य, मध्यवित्त तथा दरिद्रोंके भोजन ... | ६४ |
| ५२–५३ | अधम, मध्यम तथा उत्तम पुरुषोंके भयका हेतु, ऐश्वर्यमदकी निन्दा ... ... | ६४-६५ |
| ५४–५५ | इन्द्रियोंको वशमें न रखनेसे हानि ... ... | ६५ |
( ९ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५६-५७ | इन्द्रियसहित मन और अमात्योंको जीतकर ही शत्रुओं-पर विजय पानेकी चेष्टाके औचित्यका प्रतिपादन | ६५-६६ |
| ५८-५९ | लक्ष्मी किसकी अत्यन्त सेवा करती हैं, भीरु पुरुष कैसे सुखपूर्वक यात्रा करता है | ६६ |
| ६०-६५ | मन और इन्द्रियोंको न जीतनेसे हानि और जीतनेसे लाभ | ६६-६७ |
| ६६-६९ | काम और क्रोधसे विज्ञानका लोप, धर्म और अर्थका विचार करके विजयसाधन-सामग्रीके संग्रहकी आवश्यकता, आन्तरिक शत्रुओंको जीतकर ही बाह्य शत्रुओंको जीतनेकी इच्छाका समर्थन | ६८ |
| ७०-७३ | दुष्ट पुरुषोंसे मेल करनेकी मनाही, पाँचों इन्द्रियोंको न जीतनेसे विपत्तिकी सम्भावना तथा दुरात्मा एवं अधम पुरुषोंमें अनसूया आदि उत्तम गुणोंका अभाव | ६८-६९ |
| ७४-७५ | क्षमाका महत्त्व | ६९-७० |
| ७६-८० | विशेष अर्थयुक्त विचित्र वाणीकी दुर्लभता, मधुर वाणीसे लाभ और कटु वचनसे हानि | ७०-७१ |
| ८१-८३ | बुद्धिके नष्ट होनेसे पराजय एवं विनाश | ७१-७२ |
| ८४-८६ | विदुरका युधिष्ठिरके गुण बताकर राजा धृतराष्ट्रका ध्यान उनकी ओर आकृष्ट करना | ७२ |
तीसरा अध्याय
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १ | धृतराष्ट्रका विदुरसे पुनः धर्मार्थयुक्त वचन कहनेका अनुरोध | ७३ |
| २-३ | विदुरके द्वारा उपदेश, आर्जव ( कोमलतापूर्ण बर्ताव ) की प्रशंसा, धृतराष्ट्रको आर्जव नामक गुणको अपनानेका आदेश | ७३ |
( १० )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४ | इस लोकमें पुण्यकीर्ति होनेसे मनुष्यकी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा ... ... ... | ७३-७४ |
| ५–३८ | केशिनीके लिये सुधन्वा और विरोचनमें अपनी-अपनी श्रेष्ठताको लेकर विवाद, दोनोंका निर्णयके लिये प्रह्लादके पास जाना, प्रह्लादके द्वारा सुधन्वाका सत्कार, उलटा न्याय देनेवाले वक्ताको प्राप्त होनेवाले दोष, प्रह्लादके द्वारा सुधन्वाकी श्रेष्ठताका निर्णय और सुधन्वाका विरोचनको प्राणदान | ७४–८३ |
| ३९ | विदुरका धृतराष्ट्रसे भूमिके लिये झूठ न बोलनेका अनुरोध ... ... ... | ८३ |
| ४०–४१ | उत्तम एवं कल्याणमयी बुद्धिसे रक्षा और सम्पूर्ण अर्थोंकी सिद्धि ... ... ... | ८३ |
| ४२–४५ | कपटीको वेद भी पापसे नहीं बचा सकते, सबके लिये त्याग देनेयोग्य दुर्गुण, साक्षी न बनानेयोग्य सात प्रकारके व्यक्ति तथा भयको दूर करनेवाले चार कर्म | ८३–८५ |
| ४६–४८ | ब्रह्महत्यारोंके समान पापी ... ... ... | ८५ |
| ४९–५० | किसकी कब परीक्षा होती है और कौन क्या हर लेता है | ८५–८६ |
| ५१–५२ | लक्ष्मीकी उत्पत्ति, वृद्धि, स्थिरता और सुरक्षाके हेतु तथा पुरुषको उद्दीप्त करनेवाले आठ सद्गुण ... | ८६ |
| ५३–५५ | राजाके द्वारा किये हुए सत्कारकी महत्ता तथा स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाले आठ सद्गुण ... | ८७ |
| ५६–५७ | धर्मके आठ मार्ग ... ... ... | ८८ |
| ५८ | वृद्धोंसे सभाकी, धर्मसे वृद्धोंकी, सत्यसे धर्मकी और निश्छलतासे सत्यकी प्रतिष्ठा ... ... ... | ८८ |
| ५९–६५ | स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले दस साधन, पापकी निन्दा और पुण्यकी प्रशंसा ... ... ... | ८८–९० |
( ११ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६६–६८ | प्रज्ञाकी प्रशंसा, भावी सुखके लिये पहलेसे ही सत्कर्म करनेकी प्रेरणा ... ... ... | ९० |
| ६९–७१ | किसकी कब प्रशंसा की जाती है, अधर्मद्वारा प्राप्त हुए धनसे दोष नहीं छिपता तथा कौन किसका शासक है, इन बातोंका विवेचन ... ... | ९१ |
| ७२–७४ | किन-किनका मूल नहीं जाना जा सकता, कौन दीर्घ कालतक पृथ्वीका पालन करता है और कौन मनुष्य पृथ्वीसे सुवर्णरूपी पुष्पका चयन करते हैं ... | ९१-९२ |
| ७५ | तीन प्रकारके कार्य ... ... | ९२ |
| ७६-७७ | दुर्योधन आदिपर राज्यका भार रखनेसे उन्नतिकी सम्भावना नहीं, पाण्डवोंके साथ पुत्रवत् व्यवहार कीजिये—यह विदुरजीकी धृतराष्ट्रको सलाह ... | ९२ |
चौथा अध्याय
| १–३ | दत्तात्रेय और साध्योंका संवाद—साध्योंका हंसरूपसे विचरनेवाले दत्तात्रेयजीसे उपदेश देनेका अनुरोध | ९३-९४ |
| ४ | हंसरूपसे दत्तात्रेयजीका उपदेश—धृति, शम और सत्य-धर्मके अनुसरणकी आवश्यकता, प्रिय और अप्रियको आत्मवत् समझनेकी प्रेरणा ... ... | ९४ |
| ५–८ | क्षमाशीलका प्रभाव, दूसरोंको गाली देने और कटुवचन कहने आदिका निषेध, कटुवचन और कटुवादीकी निन्दा ... ... ..: | ९४-९५ |
| ९–११ | गाली और कटुवचनके सह लेनेसे पुण्यकी पुष्टि, जैसा सङ्ग वैसा रङ्ग तथा देवता किसके आगमनकी बाट जोहते हैं, इत्यादि बातोंका विवेचन ... | ९५-९६ |
( १२ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १२-१५ | वाणीकी चार विशेषताएँ—जैसा साथ वैसा भाव, निवृत्तिसे मुक्ति और दुःखका अभाव तथा समताकी प्रशंसा ... ... ... | ९६-९७ |
| १६-२१ | उत्तम, मध्यम और अधम मनुष्योंकी पहचान तथा अधम पुरुषोंकी सेवाको त्यागनेकी आज्ञा ... | ९७-९९ |
| २२-२४ | धृतराष्ट्रका विदुरसे महाकुलीन पुरुषोंके लक्षण पूछना और विदुरके द्वारा उनके प्रश्नोंका उत्तर | ९९-१०० |
| २५-२८ | किन-किन कर्मोंसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं—इसका प्रतिपादन ... ... | १००-१०१ |
| २९-३१ | सदाचार ही कुलीनताका मूल है, सदाचारके नाशसे सब कुछ नष्ट हो जाता है ... | १०१ |
| ३२-३३ | राजकुल तथा राजसभामें किन लोगोंका होना अभीष्ट नहीं है ... ... | १०१-१०२ |
| ३४-३५ | अतिथि-सत्कारके लिये सर्वसुलभ वस्तुएँ तथा उनका सदुपयोग ... ... | १०२ |
| ३६-३८ | महाकुलीन पुरुषकी प्रशंसा, उत्तम मित्रके लक्षण | १०२-१०३ |
| ३९-४० | चञ्चलचित्त पुरुषके पास न तो मित्र ठहरते हैं और न उसे अर्थकी प्राप्ति होती है—इसका प्रतिपादन | १०३ |
| ४१-४५ | दुष्ट पुरुषोंके स्वभाव, कृतघ्नोंकी निन्दा, मित्रोंके सत्कारकी आवश्यकता तथा संताप और शोकसे हानि | १०४ |
| ४६-४७ | हर्ष और शोक त्याज्य हैं ... ... | १०५ |
| ४८ | इन्द्रियोंकी विषयपरायणतासे बुद्धिका ह्रास ... | १०५ |
| ४९-५० | धृतराष्ट्रके उद्वेगपूर्ण वचन और उद्वेगशून्य शान्तपदकी जिज्ञासा ... ... | १०६ |
( १३ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५१-५४ | विदुरजीका धृतराष्ट्रको शान्ति और सुखके उपाय बताना ... ... ... | १०६-१०७ |
| ५५-५७ | आपसमें वैर-विरोध रखनेवाले लोगोंको सुख-शान्तिकी दुर्लभता ... ... | १०७-१०८ |
| ५८-६० | जाति-बन्धुओंसे सम्भावित भय, सामूहिक शक्तिकी प्रबलता, आपसकी फूटसे दुःख और एकतासे सुख | १०८-१०९ |
| ६१ | ब्राह्मणों, स्त्रियों, जाति-भाइयों और गोओंपर बल दिखानेसे पतन ... ... | १०९ |
| ६२-६५ | संघ-शक्तिकी प्रशंसा ... ... | १०९-११० |
| ६६-६७ | कौन-कौन अवध्य हैं और मनुष्यमें क्या गुण है | ११० |
| ६८-६९ | क्रोधको पीनेसे शान्ति, रोगीका सुखका अभाव | ११०-१११ |
| ७०-७४ | धृतराष्ट्रको उलाहना देते हुए विदुरका उनसे कौरव-पाण्डवमें मेल एवं सन्धि करानेका आग्रह | १११-११२ |
पाँचवाँ अध्याय
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-६ | यमराजके दूत किन्हें नरकमें ले जाते हैं ... | ११३-११४ |
| ७-८ | जो जैसा करे उसके साथ वैसे बर्तावकी नीति, कौन क्या नष्ट करता है ... | ११४-११५ |
| ९-११ | मनुष्य पूरे सौ वर्षोंतक क्यों नहीं जीवित रह पाता, धृतराष्ट्रका यह प्रश्न और विदुरके द्वारा इसका उत्तर ... ... | ११५-११६ |
| १२-१३ | ब्रह्महत्यारोंके समान पापी ... | ११६ |
( १४ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १४-१६ | स्वर्गलोकके अधिकारी विद्वान्के गुण, अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवालेकी दुर्लभता तथा राजाका सच्चा सहायक ... ... | ११६-११७ |
| १७-१८ | आत्म-कल्याणके लिये सब कुछ त्यागने तथा धन एवं स्त्रीद्वारा भी आत्मरक्षा करनेका आदेश ... | ११७ |
| १९-२१ | जुएको वैरका कारण बताते हुए विदुरका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंके प्रति किये जानेवाले दुर्व्यवहारके लिये उलाहना ... ... ... | ११७-११८ |
| २२-२३ | राजा भृत्योंका विश्वासपात्र कैसे बनता है, सेवकोंकी जीविका बन्द करनेसे हानि ... | ११८-११९ |
| २४-२७ | सुयोग्य सहायकोंकी आवश्यकता, स्वामीके कृपापात्र सेवकके गुण, त्यागनेयोग्य भृत्यके दुर्गुण तथा दूतके आठ गुण ... ... | ११९-१२० |
| २८-२९ | सावधान मनुष्य क्या-क्या न करे ... | १२०-१२१ |
| ३० | किनके साथ लेन-देनका व्यवहार न करे ... | १२१ |
| ३१-३२ | पुरुषको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण तथा राजसम्मानकी महत्ता ... ... | १२१-१२२ |
| ३३-३४ | स्नानसे दस और स्वल्पाहारसे छः लाभ ... | १२२ |
| ३५-३६ | किसको अपने घरमें न ठहरने दे और किन लोगोंसे कभी सहायताकी याचना न करे ... | १२२-१२३ |
| ३७ | सेवन करनेके अयोग्य छः प्रकारके मनुष्य ... | १२३ |
| ३८-३९ | धन और सहायक एक-दूसरेके आश्रित हैं, वानप्रस्थ-आश्रम कब ग्रहण करे ... | १२३-१२४ |
( १५ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४०-४१ | सम्पूर्ण सिद्धियोंका मूलमन्त्र क्या है, किसे अपनी जीविकाके नाशका भय नहीं होता ... | १२४ |
| ४२-४६ | पाण्डवोंके साथ होनेवाले युद्धका दुष्परिणाम बताकर उनके परस्पर मेलसे होनेवाले लाभका दिग्दर्शन कराना ... ... | १२४-१२६ |
| ४७ | पापासक्त मनुष्य दूसरोंके दुर्गुणपर ही दृष्टि रखते हैं | १२६ |
| ४८-५० | धर्माचरणसे अर्थसिद्धि, बुद्धिको पापसे दूर रखनेमें लाभ; धर्म, अर्थ और कामके समयानुसार सेवनका फल ... ... | १२६ |
| ५१ | राजलक्ष्मीका अधिकारी कौन है ... | १२७ |
| ५२-५५ | मनुष्योंके पाँच प्रकारके बल ... | १२७ |
| ५६-५७ | महान् शक्तिशालीसे वैर न करे, विद्वान् पुरुष किनपर भरोसा नहीं करते ... | १२७-१२८ |
| ५८-५९ | बुद्धिकी प्रबलता, किनका अनादर न करे ... | १२८ |
| ६०-६२ | कुटुम्बीजन काठमें छिपी हुई आगके समान हैं, उनके फूटनेसे सब कुछ भस्म हो सकता है—इसका प्रतिपादन ... ... | १२८-१२९ |
| ६३-६४ | कौरव और पाण्डवोंमें लता और वृक्षका तथा वन और सिंहका-सा सम्बन्ध है, अतः इन्हें मिलकर रहना चाहिये, यह धृतराष्ट्रको बताना ... | १२९ |
छठा अध्याय
| १ | माननीय वृद्ध पुरुषोंके आनेपर खड़े होने और प्रणाम करनेकी आवश्यकता ... | १३० |
( १६ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २-३ | अतिथि-सत्कारका क्रम और अतिथिके सत्कार-ग्रहण न करनेपर गृहस्थ-जीवनकी व्यर्थता ... | १३०-१३१ |
| ४-५ | पैर न धोनेयोग्य अतिथि, न बेचनेयोग्य वस्तुएँ | १३१ |
| ६-७ | सच्चे संन्यासी तथा पुण्यात्मा वानप्रस्थीका लक्षण | १३१-१३२ |
| ८-९ | बुद्धिमान्की बड़ी बाँहें होती हैं, राजा कहीं भी अधिक विश्वास न करे ... ... | १३२ |
| १०-११ | मनुष्यको कैसा होना चाहिये, स्त्रियोंके विशेष संरक्षणकी आवश्यकता ... ... | १३२-१३३ |
| १२-१४ | किसको किसकी रक्षाका भार सौंपे, कौन किससे उत्पन्न हुआ है और कुलीन संत कैसे होते हैं—इसका विवेचन ... ... | १३३-१३४ |
| १५-२१ | कौन राजा दीर्घकालतक ऐश्वर्य भोगता है, अपनी मन्त्रणा दूसरोंपर कैसे प्रकट नहीं होती, गुप्त-मन्त्रणाके स्थान, मन्त्री न बनानेयोग्य व्यक्ति, मन्त्रीका उत्तरदायित्व तथा मन्त्रणाकी रक्षासे ही राजाको सिद्धिकी प्राप्ति ... | १३४-१३५ |
| २२-२४ | बुरे कर्मोंका दुष्परिणाम, उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे लाभ तथा मन्त्रणा सुननेका अधिकारी ... | १३५ |
| २५-२६ | किस राजाके अधीन पृथ्वी होती है और किसे वह धन देती है ... ... | १३६ |
| २७ | राजा अकेले सब कुछ न हड़प ले ... | १३६ |
| २८-२९ | किसको कौन जानता है, वशमें आये हुए शत्रु का वध आवश्यक है ... | १३६-१३७ |
| ३०-३३ | कहाँ-कहाँ क्रोधको रोकना चाहिये, निरर्थक कलहके त्यागसे लाभ, कैसे राजाको प्रजा नहीं चाहती, विद्वान् पुरुषकी श्रेष्ठता ... | १३७ |
( १७ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३३-३५ | मूर्ख और दुष्टके बर्ताव तथा उसपर विपत्तिकी सम्भावना | १३८ |
| ३६-३७ | सम्पूर्ण भूतोंको अपना बना लेनेवाले गुण, श्रेष्ठ राजाको बिना धनके भी सहायक मिलते हैं | १३८ |
| ३८-३९ | लक्ष्मीको बढ़ानेवाले सात गुण तथा त्याग देने-योग्य राजा | १३८-१३९ |
| ४०-४१ | निर्दोषको सतानेसे हानि, जिससे अपनी हानि हो उन्हें प्रसन्न रखनेकी आवश्यकता | १३९ |
| ४२-४३ | किनके हाथोंमें पड़े हुए पदार्थ संशयमें पड़ जाते हैं तथा कौन लोग विपत्तिके समुद्रमें डूबते हैं | १३९ |
| ४४-४५ | कौन पण्डित है, किस मनुष्यका जीवन खतरेमें होता है | १४० |
| ४६-४७ | पाण्डवोंको त्यागकर दुर्योधनको राज्य देना उसके पतनका कारण होगा—यह विदुरजीकी चेतावनी | १४० |
| सातवाँ अध्याय | ||
| १ | मनुष्य प्रारब्धके अधीन है—यह धृतराष्ट्रका कथन | १४१ |
| २-४ | विदुरका उपदेश—समयके विपरीत बोलनेसे अपमान, कौन प्रिय होता है, प्रिय और अप्रिय व्यक्तिके कार्योंमें दृष्टिभेद | १४१-१४२ |
| ५ | एक दुर्योधनके न त्यागनेसे सौ पुत्रोंके नाशकी सम्भावना | १४२ |
| ६-७ | क्षय और वृद्धिकी व्याख्या | १४२ |
| ८-९ | गुणहीन धनियोंके त्यागकी आशा, धृतराष्ट्रका पुत्रको त्यागनेमें अपनी असमर्थता बताना | १४३ |
( १८ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १०-१३ | गुणवान् और विनयशीलका स्वभाव, दुष्टोंसे लेन-देन करनेमें दोष तथा उनको साथ रखनेकी भी निन्दा | १४३-१४४ |
| १४-१६ | महान् दोषोंसे युक्त पुरुष त्याज्य हैं, नीच पुरुषोंका प्रेम नश्वर होता है, नीचका स्वभाव और नीच पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देनेकी प्रेरणा ... | १४४-१४५ |
| १७-३२ | जाति-भाइयोंकी रक्षा और सत्कारका महत्त्व बताते हुए उनसे मिलकर रहने और पाण्डवोंको उनका न्यायोचित हक देनेके लिये धृतराष्ट्रसे विदुरजीका अनुरोध ... ... | १४५-१४८ |
| ३३-३५ | कौन दीर्घकालतक यशका भागी होता है, कौनसा ज्ञान व्यर्थ है, किसका अभ्युदय और किसका पतन होता है ... ... | १४८-१४९ |
| ३६-३८ | मन्त्रभेदके छः द्वार और उन्हें बन्द रखनेका महत्त्व | १४९ |
| ३९-४१ | शास्त्रज्ञान और वृद्धोंकी सेवाका महत्त्व, कौन वस्तु कहाँ नष्ट होती है और बुद्धिमान् पुरुष कैसी मैत्री करे ... ... | १५० |
| ४२-४३ | किस गुणसे किस अवगुणका नाश होता है और कुलकी परीक्षा कैसे की जाती है ... | १५०-१५१ |
| ४४-४७ | स्वतःप्राप्त भोगसामग्रीका विरोध न करे, कैसे सुहृद्की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये, कौन सैकड़ों कुलीनोंसे बढ़कर हैं और किनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती ... ... | १५१ |
| ४८-५० | खोटी बुद्धिवालेको त्यागनेकी आवश्यकता, किनके साथ मित्रता न करे और मित्र कैसा होना चाहिये | १५२ |
( १९ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५१-५६ | इन्द्रियोंको सर्वथा रोकने अथवा बिलकुल खुली छोड़ देनेसे हानि, आयु बढ़ानेवाले सद्गुण, वीर पुरुषोंका व्रत क्या है, कौन मनुष्य कभी अर्थसे हीन नहीं होता तथा कल्याणकारी कार्य और उन्हें करनेकी आवश्यकता ... ... | १५२-१५३ |
| ५७-५९ | अनिर्वेदका महत्त्व तथा क्षमाकी महिमा ... | १५४ |
| ६०-६४ | किस सुखका यथेष्ट सेवन करे, किनके यहाँ लक्ष्मीका वास नहीं होता, दुष्ट पुरुषोंके बर्ताव, लक्ष्मी किसके पास भयके मारे नहीं जातीं तथा राजलक्ष्मीका स्वभाव कैसा होता है ... ... | १५४-१५५ |
| ६५-६८ | किसका क्या फल है, किस कर्मका फल परलोकमें नहीं मिलता, सत्त्वसम्पन्न पुरुषोंकी निर्भयता तथा उन्नतिके मूल हेतु ... ... | १५५-१५६ |
| ६९-७१ | किनका कौन-सा बल है, व्रतको नष्ट न करनेवाली आठ वस्तुएँ तथा संक्षेपसे धर्मका स्वरूप ... | १५६-१५७ |
| ७२-७६ | किससे किसको जीते, किनपर विश्वास न करे, नित्य गुरुजनोंको प्रणाम करनेसे लाभ, कैसे धनकी ओर मन न लगावे और कौन-कौन शोचनीय हैं | १५७ |
| ७७-८१ | किसके लिये क्या बुढ़ापा है, किसका क्या मल है और किससे किसको जीतनेकी चेष्टा न करे ... | १५८ |
| ८२-८५ | किसका जीवन सफल है, लोभ या इच्छाका परित्याग करे, पृथ्वीके सम्पूर्ण भोग एक पुरुषके लिये पर्याप्त नहीं हैं, धृतराष्ट्रसे अपने पुत्रों और पाण्डवोंपर समान बर्ताव करनेका अनुरोध ... ... | १५९ |
( २० )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| आठवाँ अध्याय | ||
| १–३ | किसको शीघ्र सुयश एवं सुखकी प्राप्ति होती है, कौन दुःखोंसे मुक्त हो सुखपूर्वक सोता है और ब्रह्महत्याके समान तीन कुकर्म ... | १६० |
| ४ | मृत्यु क्या है, लक्ष्मीका वध कैसे होता है और विद्याके तीन शत्रु कौन हैं ... | १६०-१६१ |
| ५–६ | विद्यार्थियोंके सात दोष, सुखार्थी या विद्यार्थी ... | १६१ |
| ७–११ | किसकी किससे तृप्ति नहीं होती, कौन किसको नष्ट कर देता है और घरमें रखनेयोग्य वस्तुएँ ... | १६१-१६२ |
| १२–१३ | जीवनके लिये भी धर्मका त्याग न करे तथा धर्म और संतोषकी महत्ता ... | १६२-१६३ |
| १४–१८ | एक दिन सभी मृत्युके अधीन होते हैं, संसारके सगे-सम्बन्धी मृतकका साथ नहीं देते, कर्म ही उसके साथ जाता है, अतः धर्मसंग्रहकी आवश्यकता ... | १६३-१६४ |
| १९–२२ | अज्ञानसे छूटने और जन्म-मृत्युरूप भयसे बचनेका उपाय ... | १६४-१६५ |
| २३–२५ | कौन कभी मोहमें नहीं पड़ता, किससे किसकी रक्षा करे तथा कौन ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे भ्रष्ट नहीं होता ... | १६६ |
| २६–२८ | कौन क्षत्रिय ऊर्ध्वलोकमें जाता है, कौन वैश्य स्वर्गमें दिव्य सुख भोगता है तथा कौन शूद्र स्वर्ग-सुखका अनुभव करता है ... | १६६-१६७ |
| २९–३२ | युधिष्ठिरको क्षात्रधर्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये धृतराष्ट्रसे विदुरका अनुरोध, विदुरकी बातें स्वीकार करते हुए भी धृतराष्ट्रका दुर्योधनके सामने अपनी विवशता बताना और प्रारब्धको प्रबल एवं पुरुषार्थको निरर्थक मानना ... | १६७-१६८ |
पहला अध्याय (महाभारत ३३वाँ अध्याय - पण्डित व मूर्ख लक्षण)
॥ श्रीहरिः ॥
विदुरनीति
हिन्दी-अनुवादसहित
पहला अध्याय
वैशम्पायन उवाच
द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
विदुरं द्रष्टुमिच्छामि तमिहानय माचिरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—[ संजयके चले जानेपर ] महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने द्वारपालसे कहा—'मैं विदुरसे मिलना चाहता हूँ । उन्हें यहाँ शीघ्र बुला लाओ' ॥ १ ॥
प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूतः क्षत्तारमब्रवीत् ।
ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रका भेजा हुआ वह दूत जाकर विदुरसे बोला— 'महामते ! हमारे स्वामी महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं' ॥ २ ॥
एवमुक्तस्तु विदुरः प्राप्य राजनिवेशनम् ।
अब्रवीद् धृतराष्ट्राय द्वाःस्थः मां प्रतिवेदय ॥ ३ ॥
२२ विदुरनीति
उसके ऐसा कहनेपर विदुरजी राजमहलके पास जाकर बोले—'द्वारपाल ! धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दे दो' ॥ ३ ॥
द्वाःस्थ उवाच
विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् ।
द्रष्टुमिच्छति ते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम् ॥ ४ ॥
द्वारपालने जाकर कहा—'महाराज ! आपकी आज्ञासे विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणोंका दर्शन करना चाहते हैं । मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय' ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेशय महाप्रज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् ।
अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—'महाबुद्धिमान् दूरदर्शी विदुरको भीतर ले आओ, मुझे इस विदुरसे मिलनेमें कभी भी अड़चन नहीं है' ॥ ५ ॥
द्वाःस्थ उवाच
प्रविशान्तःपुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमतः ।
न हि ते दर्शनेऽकल्पो जातु राजाब्रवीद्धि माम् ॥ ६ ॥
द्वारपाल विदुरके पास आकर बोला—'विदुरजी ! आप बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्रके अन्तःपुरमें प्रवेश कीजिये। महाराजने मुझसे कहा है कि मुझे विदुरसे मिलनेमें कभी अड़चन नहीं है' ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् ॥ ७ ॥
पहला अध्याय २३
वैशम्पायनजी कहते हैं—तदनन्तर विदुर धृतराष्ट्रके महलके भीतर जाकर चिन्तामें पड़े हुए राजासे हाथ जोड़कर बोले—॥ ७ ॥
विदुरोऽहं महाप्राज्ञ सम्प्राप्तस्तव शासनात्।
यदि किञ्चन कर्तव्यमय्यमस्मि प्रशाधि माम् ॥ ८ ॥
'महाप्राज्ञ ! मैं विदुर हूँ, आपकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ। यदि मेरे करनेयोग्य कुछ काम हो तो मैं उपस्थित हूँ, मुझे आज्ञा कीजिये' ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
सञ्जयो विदुर प्राज्ञो गर्हयित्वा च मां गतः।
अजातशत्रोः श्वो वाक्यं सभामध्ये स वक्ष्यति ॥ ९ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—विदुर ! संजय आया था, मुझे बुरा-भला कहकर चला गया है। कल सभामें वह अजातशत्रु युधिष्ठिरके वचन सुनावेगा ॥ ९ ॥
तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मया।
तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत् प्रजागरम् ॥ १० ॥
आज मैं उस कुरुवीर युधिष्ठिरकी बात न जान सका—यही मेरे अङ्गोंको जला रहा है और इसीने मुझे अबतक जगा रखा है ॥ १० ॥
जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि।
तद् ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि ॥ ११ ॥
तात ! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जग रहा हूँ। मेरे लिये जो कल्याणकी बात समझो, वह कहो; क्योंकि हम-लोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो ॥ ११ ॥
२४
विदुरनीतिः
यतः प्राप्तः सञ्जयः पाण्डवेभ्यो न मे यथावन्मनसः प्रशान्तिः। सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि किं वक्ष्यतीत्येव मेऽद्य प्रचिन्ता ॥ १२ ॥
संजय जबसे पाण्डवोंके यहाँसे लौटकर आया है, तबसे मेरे मनको पूर्ण शान्ति नहीं मिलती। सभी इन्द्रियाँ विकल हो रही हैं। कल वह क्या कहेगा, इसी बातकी मुझे इस समय बड़ी भारी चिन्ता हो रही है ॥ १२ ॥
विदुर उवाच
अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम्। हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ॥ १३ ॥
विदुरजी बोले—जिसका बलवान्के साथ विरोध हो गया है उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको, जिसका सब कुछ हर लिया गया है उसको, कामीको तथा चोरको रातमें जागनेका रोग लग जाता है ॥ १३ ॥
कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि नराधिप। कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन्न परितप्यसे ॥ १४ ॥
नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान् दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप कष्ट नहीं पा रहे हैं? ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः। अस्मिन् राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसम्मतः ॥ १५ ॥
पहला अध्याय [२५]
धृतराष्ट्रने कहा—मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करनेवाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि इस राजर्षिवंशमें केवल तुम्हीं विद्वानोंके भी माननीय हो ॥ १५ ॥
विदुर उवाच
राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् ।
प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥
विदुरजी बोले—महाराज धृतराष्ट्र ! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंके स्वामी हो सकते हैं। वे आपके आज्ञाकारी थे, पर आपने उन्हें वनमें भेज दिया ॥ १६ ॥
विपरीततरश्च त्वं भागधेये न सम्मतः ।
अर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥ १७ ॥
आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखोंसे अन्धे होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें आपकी सम्मति नहीं हुई ॥ १७ ॥
अनृशंस्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात् ।
गुरुत्वात्त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम हैं; वे आपमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इन्हीं सद्गुणोंके कारण वे सोच-विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं ॥ १८ ॥
दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा ।
एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥ १९ ॥